<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398</id><updated>2009-12-29T09:06:00.239+05:30</updated><title type='text'>रुद्र शक्ति</title><subtitle type='html'>वीणा-वादिनी वाग्देवीच्या चरणी। घालितो शब्दांचे लोटांगण॥
घेऊन पदरी शारदेने। करावे त्यांसी पावन॥</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>70</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-2600198421087392758</id><published>2009-12-29T09:06:00.001+05:30</published><updated>2009-12-29T09:06:00.340+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दीर्घकथा'/><title type='text'>रेखांकित - अंतिम भाग</title><content type='html'>मेघनाने घाबरत फोन उचलला आणि तिला परत घाम फुटायला लागला. तिने घाबरून आईकडे बघितल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काय झाल?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अनिकेतचा अपघात झालाय"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अग बाई, कुठे झाला? कुठे दाखल केलय?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघनाने गाडीची किल्ली उचलली आणि ती धावत बाहेर पडली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेघना, कुठे जातेयस? कुठल्या दवाखान्यात आहे तो? थांब, मी पण येते. अशी एकटी नको जाऊस. " &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो पर्यंत मेघना गाडी पर्यंत पोचली होती. तिने गाडी चालू केली आणि क्षणभर ती विचार करु लागली. तो पर्यंत आई मागुन अक्षरशः धावत येत होती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मी दवाखान्यात जात नाही या आई.  काळजी करु नकोस "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काळजी काय नको करूस. हे बघ शांत हो. मी चालवते गाडी"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघनाने ते न ऐकता भरकन गाडी वळवली आणि फाटका बाहेर पडली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेघना...." आई मागुन हाका देत राहिली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघना टेकडीच्या पायथ्याशी पोचली.  बाबा एकटाच पुस्तक वाचत बसला होता. त्याने दुरुन मेघनाला येतांना बघितल. पुस्तक बाजुला ठेउन तो उठला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आओ बेटी।" त्याने न हसता मेघनाच स्वागत केल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघना काहीच बोलली नाही. नुसतीच जमिनीकडे बघत उभी राहिली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबालाही काय बोलाव सुचेना. मेघना इथे परत आलीय म्हणजे नको ते घडलय असा त्याने कयास लावला. पण मेघना परत इथे येइल हेच बहुधा त्याला अपेक्षित नसाव. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बैठो"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मी इथे कधी आलीच नसती तरी हे सगळ असच घडल असत का?" तिने बाबाच बोलण कापत एकदम विचारल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बेटी, तुम्हारा यहां आना या न आना कोई मायने नही रखता। मैने तो केवल संदेसा देने का काम किया था। लिखने वाला तो कोई और है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पण इतक्या लौकर कस सगळ घडल? अजुन एक-दोन महिने मिलाले असते तर काही तरी करता आलं असत." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बच्चे, होनी को तो स्वयं भगवान नही टाल सकते। तुम कुछ कर पाती थी ये तुम्हारा भ्रम है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मी दुसर लग्न केल असत तर..?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तो?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मै किसी और की परिणिता हुई होती। और अनिकेत की जान खतरे मे ना होती।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुमने शायद परिणीता का अर्थ गलत समझा। जिसकी मृत्यु होनी थी उसिकी मृत्यु हुई है। विधिलिखित उसे ही कहते है। तुम तन-मन से जिसकी हो चुकी थी उसकी मृत्यु अटल थी। शादी होना याने परिणिता होना आवश्यक नही है। किसी और मे विलिन हो जाना याने परिणीता होना है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघना ने आ वासला. तिला रडण आवरेना. ती रडत खाली बसली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"रो मत ऐसा भी नही कहे सकता।" बाबाचाही चेहरा केविलवाणा झाला होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"म्हणजे माझंच नशिब नाट होत." ती रडत म्हणाली. "मी त्याला भेटली नसती तर तो जिवंत असता"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पण मग त्याच्या ऐवजी अजुन कोणी मेलं असत." तिल अजुन भडभडुन आलं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बच्चे इसमे तुम्हार कोई दोष नही है। अब मै तुम्हे कैसे समझाऊ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"एक कहानी सुनो। एक चिडिया पंछीयों के राजा गरूड के पास आती है और कहती है - 'महाराज, मैने कल बहोत बुरा सपना देखा।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्यों क्या हुआ?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मेरे सपने मे यमराज आऐ थे। और उन्होने कहा की आज मेरी मृत्यु अटल है। अब आप ही मुझे अभय दे सकतें है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पर पक्षीराज ने कहा ' तुम चिंता मत करो। तुम्हारा रक्षण करना मेरा कर्तव्य है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा कहे की वे उस चिडिया को पीठ पर डाले दुनिया के दुसरी और उड पडे। वहां एक आसमान को छुंती हुई सिधी चट्टान थी। उसके मध्य मे एक छोटी सी गुफां थी। वहां पर उन्होने वो चिडिया को रखा और कहां - 'इतनी दूर और इतने उंचे मेरे अतिरिक्त किसी की उडान नहीं है। यहां और कोई नही आ सकता। और गुंफा के द्वार पर मै पहेरा देता रहुंगा। तुम यहां निश्चिंत रहो।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा कहे के वे दरवाजे की और मुडते न मुडते इतने मे  पलक झपकते ही गुफां मे छिपे एक साप ने उस चिडिया को निगल लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब गरूड राज अचंबित हो गये। ये तो बडा अन्याय हुआं। वे सिधा यमराज के पास गये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या मै पक्षीराज होना कोई मायने नही रखता? उन्होने यमराज को क्रोधित स्वरों मे प्रश्न पुछां। 'वो चिडिया मेरे अभय मे थी और फिर भी उसका अंत ऐसा हुआ?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'महाराज स्वयं आप के मृत्यु पे आप के हातों मे नही है तो उस चिडिया की मृत्यु कैसे रोक पाते?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गरुड राज ने पुछां 'फिर ऐसा ही होना तो आप ने उस चिडिया के सपने मे आकर मेरे से खिलवाड क्यों  किया?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"उस चिडिया की मृत्यु दुनिया के दुसरी और एक आसमान को छुंती चट्टान पर लिखि थी। अब उस नन्ही जान मे इतनी शक्ति ना थी। समझ लो आप ने मेरा काम सरल कर दिया।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गरुडराज संतुष्ट न हुए। उन्होने फिर पुंछा "जन्म का कारण पता नही और मृत्यु कब और क्यों होगी ये भी पता नहीं। और जीवन भी पूर्व संचित कर्मों की छाया बितता है। चिडिया की मृत्यु अटल थी और मै कर्ता होने का तो केवल भ्रम है। ऐसे जीवन का क्या अर्थ है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"राजन्, पूर्व संचित कर्म मानो घट है। पर घट भरना यही जीवन है। और प्रात्प परिस्थिती मे अच्छे कर्मोंसे घट भरना यही मुक्ति का मार्ग है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ना आप का जन्म पे अधिकार है ना मृत्यु पर। तो उस सोच मे समय बिताना व्यर्थ है।' बाबा ने गोष्ट संपवली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बेटी पुंछ के जनम नही होता और मृत्यु अनुमती की राह नही देखती। उसकी मृत्यु अटल थी, तुम केवल कारण थी। इसमे तुम्हारा दोष नही है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघना काहीच बोलली नाही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पर जीवन तुम्हारे हातों मे है। उसे संभाल के रखो।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघना ला रडण आवरत नव्हत. तिला बाबाचे शब्द नीटसे ऐकुही येत नव्हते. तिला अनिकेत सगळीकडे दिसायला लागला. तो गेलाय याची तिने नीट खात्री सुध्दा केली नव्हती. मोठ्ठा अपघात झालाय आणि त्याच्या मित्राचा आवाज ऐकुनच तिने काय नेमक झाल असेल हे ताडल होत आणि धावत बाबा कडे आली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिचारा एकटा पडला असेल तिथे, माझी वाट बघत असला वेडा विचार तिच्या मनाला रुतत होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पण अनिकेतने काय केल होत की त्याचा अंत असा व्हावा. इतका चांगला होता तो. कधी कोणाचं वाईट केल नसेल त्याने. माझा जीव होता तो. आता कशी जगु मी. काय केल होत अस की माझ्या नशिबी हा भोग आहे" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा काहीच बोलला नाही. त्याचेही डोळे पाणावलेले होते. तिची पाठ थोपटत तो दूर कुठे तरी शुन्यात बघत होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(समाप्त)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-2600198421087392758?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/2600198421087392758/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=2600198421087392758' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/2600198421087392758'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/2600198421087392758'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/12/blog-post_29.html' title='रेखांकित - अंतिम भाग'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-1131453448192315297</id><published>2009-12-04T08:34:00.001+05:30</published><updated>2009-12-04T21:12:04.945+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दीर्घकथा'/><title type='text'>रेखांकित भाग ४</title><content type='html'>"कसली आयडिया आहे?" अनिकेत ने बाईक ला किक मारत थंडपणे विचारल.&lt;br /&gt;"वर चल, सांगते?" त्याचा थंडपणा बघुन तिच्या कपाळावर आठ्यांनी घर मांडल.&lt;br /&gt;"पिक्चर वाटतोय का तुला? कि आपण अस करु आणि तस करु. थोडी झाडा भोवती गाणी गाऊ या आणि मग विलन ची एंट्री" तो बारीक डोळे करुन शुन्यात बघु लागला.&lt;br /&gt;"पण इथे विलन कोण आहे याचा विचार करावा लागेल. तुझ्या कपाळावरच्या रेषा कि माझ्या तळव्यात नाहिश्या होणार्‍या रेखा"&lt;br /&gt;मेघनाच्या डोळ्यातुन परत गंगा-जमुना वहायला लागल्यात. दोघेही पावसात चिंब भिजले होते.&lt;br /&gt;पहिल्या मजल्यावरच्या जोशी काकु खिडकी उघडुन भोचक पणे काय चाललय बघु लागल्यात.&lt;br /&gt;"काय काकु, काय म्हणता ?" अनिकेतने कुचक्या आवाजात विचारल.&lt;br /&gt;"काही नाही रे" त्या थोड्या वरमल्या मग चाचपडत म्हणाल्या "आत जा रे दोघे. सर्दी व्हायची. मेघना, नुकतीच तापातुन उठतेयस ना"&lt;br /&gt;"हो खर सांगायच तर मलाही हिच्यासारख सर्दी -ताप हवाय. तुम्ही खिडकी बंद करुन घ्या, तुम्हालाही व्हायची सर्दी. नाहीतर इथे आमच्या जवळ येउन उभ्या रहा. काय बोलतोय ते ऐकु येईल नीट"&lt;br /&gt;जोशी काकुंनी लगबगीने खिडकी लोटली.&lt;br /&gt;"मेघना काय तमाशा लावलायस. जा बर आत. आधीच तब्येत बरी नाही या तुझी"&lt;br /&gt;"लाज नाही वाटत का तमाशा म्हणायला?" मेघना फणकारली.&lt;br /&gt;"तुला आत्ता जिथे जायचय तिथे जा पण मी तुझा पिच्छा असा सोडणार नाही या. मी तुला कधीच सोडणार नाहीया. जिथे जाशिल तिथे मी तुझ्या मागे-मागे येइन. मग तु कुठेही जा"&lt;br /&gt;क्षणभर अनिकेत ला काय बोलाव सुचेना. त्याने गाडी बंद केली आणि स्टँड लाउन तो जिन्याच्या दिशेनी चालायला लागला. मेघना तशीच उभी होती.&lt;br /&gt;"आत्ताच तर मारे सांगत होतीस की जिथे जाशिल तिथे मागे-मागे येइन म्हणुन, मग?"&lt;br /&gt;वरची खिडकी पुन्हा किलकिली उघडली.&lt;br /&gt;"काकु, आल घालुन चहा करा लौकर आणि सोबत भजी पण चालतील"&lt;br /&gt;खिडकी घट्ट बंद झाली.&lt;br /&gt;मेघनाला खुदकन हसु आल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घरात आल्याबरोब्बर मेघनाने अनिकेतला घट्ट मिठी मारली. अनिकेतने काहीच हालचाल केली नाही.&lt;br /&gt;"अस काय करतोस?"&lt;br /&gt;तिला दूर सारत तो परत खिडकी जवळ गेला. "सांगतेस का काय ते?"&lt;br /&gt;"फोटो काढायला हवा खिडकी जवळ. अनिकेत खिडकीवाले"&lt;br /&gt;"सांग"&lt;br /&gt;"मी दुसर्‍या कोणाशी लग्न करीन" अस म्हणुन ती क्षणभर अनिकेतची प्रतिक्रिया बघायला थांबली&lt;br /&gt;त्याच्या चेहर्‍यावरची माशी सुध्दा हलली नाही.&lt;br /&gt;"मला बोलवु नकोस म्हणजे झाल. अर्थात तो पर्यंत मी असलो तर"&lt;br /&gt;"ऐक तर. बाबा ने सांगितल कि मी ज्याची परीणिता होणार त्याचा मृत्यु अटळ आहे. आणि आपण धरुन बसलोय की मी तुझीच  परीणिता होणार. मी जर का दुसर्‍याशी लग्न केल तर प्रश्नच मिटला"&lt;br /&gt;अनिकेत मेघना कडे रोखुन बघत होता.&lt;br /&gt;"अरे म्हणजे तात्पुरत...."&lt;br /&gt;"कळल मला" तो तीक्ष्ण स्वरात तिला कापत म्हणाला. " म्हणजे माझ्या ऐवजी दुसरा कोणी तरी मरणार"&lt;br /&gt;"काय करायच मग तुच सांग. मला काय हौस आहे कोणाला मारायची. माझ्या नशिबी कोणी मरणार तर त्याला मी काय करणार? पण तुला मी काही होउ देणार नाही एवढ नक्की"  अस म्हणुन ती परत रडायला लागली.&lt;br /&gt;"किती रडशील? काही झाल की नळ चालु" अनि त्रागाने  म्हणाला. "शांत बस बर थोडी. मला विचार करु दे"&lt;br /&gt;"हो, बोल मला अजुन. मीच ऐकुन घेते म्हणुन"&lt;br /&gt;अनिच्या डोक्यात विचारांच अचानक वादळ उठल. त्याने सगळी आशाच सोडली होती पण मेघनाची युक्ती ऐकुन त्याला काही तरी होउ शकत या विचाराने हुरहुरी आली होती. पण अजुन कोणी मरणार या विचाराने त्याच मन कच खात होत.&lt;br /&gt;तो नुसताच येर-झार्‍या मारु लागला.&lt;br /&gt;"बोल ना, अस काय करतोस?"&lt;br /&gt;"काय बोलु, काय अपेक्षा आहे तुझी?"&lt;br /&gt;"हो म्हण फक्त म्हणजे झाल"&lt;br /&gt;"अरे, गंमत वाटतेय का तुला? हो काय राख म्हणु" अनिकेत ओरडला.&lt;br /&gt;"सॉरी, मला ओरडायच नव्हत.&lt;br /&gt;थोडा वेळ अनिकेत काहीच बोलला नाही.&lt;br /&gt;"अस कस अजुन कोणाला मरू देउ मी माझ्या ऐवजी?"&lt;br /&gt;"अनि, तू कोणाला मारत नाहीयास. तू उगाचच मनाला घोर लाउन घेतोयस. आपण इथे कोणाच्या खुनाचा प्लॅन करत नाहीया. अस बघ की माझ्या नशिबी त्या दिवशी जसलीन सोबत त्या बाबा कडे जाण होत. मी नाही म्हणत असतांना त्या बाबा कडुन हे सगळ ऐकल, उगाचच का अस सगळ घडुन आल? यातुन मार्ग काढता यावा, यातुनही मार्ग निघु शकतो याची चिन्ह आहेत ही सगळी. काहीच माहिती नसत तर काय केल असत? आता सगळ माहिती असुन काहीच न करण हेच चुकीच ठरेल."&lt;br /&gt;मेघनाचा युक्तीवाद वर्मी लागला.&lt;br /&gt;"बरं ठीक आहे. तु म्हणतेयस तस करु"&lt;br /&gt;तेवढ्यात मेघनाचा सेल वाजला.&lt;br /&gt;"आई येतेय परत"&lt;br /&gt;अनि ने मोठ्ठा उश्वास सोडला.&lt;br /&gt;"आई येतेय तर मी काय करु?"&lt;br /&gt;"नाही ग, तस काही म्हणत नाही या. निघतो मी. मगासचे ओले उभो आहोत. तु तर नुकतीच तापातुन उठलीयस. आराम कर आता. मला ही खुप थकल्या सारख वाटतय"&lt;br /&gt;"हस ना एकदा"&lt;br /&gt;"रात्री फोन कर."&lt;br /&gt;"हो करीन पण तू हस ना एकदा.&lt;br /&gt;"काय करतेयस लहान पोरी सारख"&lt;br /&gt;"प्लीज..."&lt;br /&gt;"मेघना..." अनिकेतला हसु आल. तो दारा बाहेर पडला.&lt;br /&gt;"नाही सोडणार अशी. माझ्याशी गाठ आहे." डोळे बारीक करत तिने हसत दरवाजा लावला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;---&lt;br /&gt;अनिकेतने गाडीला किक मारली. वर बघितल तर मेघना खिडकीतुन  बघत होती. त्याने गाडी वळवली आणि अंगणातुन बाहेर पडला. पाऊस अजुनही पडत होता. त्याला घरी जावस वाटत नव्हत. हळु-हळु गाडी चालवत तो मुख्य रस्त्यावर आला. कुठल्या मित्राकडे चक्कर मारावी याचा विचार तो करत होता. पण त्याच मन सारख मेघनाने सुचवलेल्या गोष्टी भोवती वळसे घालत होत. खरच का मेघना ने दुसर्‍याशी लग्न केल तर आपला जीव वाचु शकतो? पण नशिब अश्यानी बदलत असत तर त्याला नशिब म्हणलच नसत. मेघना दुसर्‍या कोणाशी लग्न करणार या विचाराने त्याच्या अंगावर काटा आला. तेवढ्यात समोरुन कोणीतरी अनि अशी आरोळी देत वेगाने निघुन गेल. कोण होत ते अनिच्य लक्षात नाही आल. त्याने उगाचच पाठमोर्‍या आकृतीला हात दाखवला. रस्त्याच्या कडेला गाडी थांबवुन तो पुढे काय करायच याचा विचार करु लागला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इकडे मेघनाला हलक वाटत होत. असल्या परिस्थितीतुन आपण मार्ग काढला या वर तिचा अजुनही विश्वास होत नव्हता. नविन मार्ग कठीण होता खरा पण असल्या अभद्र खेळाला असलीच शहनिशा देण आवश्यक होत. तिने भिजलेले कपडे बदलले. आणि अंथरुणावर अंग टाकल. तिच्या डोक्यात गेले दोन तास घडलेल सगळ घिरट्या मारत होते. अनिकेतचे बाणासारखे टोचणारे शब्द, त्याच असहाय रडण, आपल्या डोक्यातली भन्नाट कल्पना सगळ सगळ चित्रपटासारख डोळ्यासमोर फिरत होत. जोशी काकुंचा भोचकपणा आठवुन तिला हसु आल. त्या आईला नक्कीच काहीतरी बोलणार मग आईला काय सांगायच याचा विचार ती करु लागली. आईने मागेच आडुन-आडुन अनिकेत बद्दल विचारल होत. आता अचानक माझ्यासाठी स्थळं बघा हे कस सांगायच. आणि अमेरिकेला जायच काय करायच? आणि लग्न करण म्हणजे काय गंमत थोडीच आहे. दुसरा पुरुष आपल्याला स्पर्श करणार या विचाराने तिच्या अंगावर काटा आला. तिने पांघरुण घट्ट छातीशी घेतल. एका उत्तराने प्रश्नांच नविन जाळ विणल होत. तिला डुलकी लागली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनिकेतने गाडीला परत किक मारली. अक्षरशः वाट फुटेल तिथे तो जात होता. आत्ता खर तर मेघना सोबत पावसात भिजत फिरायला मजा आली असती. रस्त्यावरचे खड्डे चुकवत तो एक हात सोडुन संथपणे गाडी चालवत होता. पाऊस परत सपाट्याने पडायला लागला होता. पावसाचे थेंब छोट्या-छोट्या सुया टोचाव्यात तसे तोंडावर टोचत होते. 'च्यक्' असा आवाज काढत त्याने गाडी परत रस्त्याच्या कडे लावली आणि एका मोठ्ठ्या डेरेदार झाडाच्या आडोश्याला जाउन उभा राहिला. आजु-बाजुला बरीच लोक उभी होती. कोणीच कोणाशी फारस बोलत नव्हत. सगळे नुसताच पाऊस बघत होते. बाजुच्या ठेल्यावरचा चहावाल्याने नविन आधण चढवलेल होत. त्या वासाने सगळीच लोक चहा घेत होती. अनिही चहाचे भुरके मारायला लागला. त्याच्या डोक्यात विचार परत घोळका मांडायला लागलेत. 'लग्न करण म्हणजे गंमत थोडीच होती. मागेच मेघना सांगत होती की तिची आई विचारत होती आपल्या बद्दल ते. आता मेघना त्यांना काय सांगणार त्यांना? स्थळं बघा म्हणुन? च्यायला थोडं बर वाटत होत तर हे सगळे प्रश्न समोर बोहारल्या सारखे उभे. कसल्या जाळ्यात फसतोय, निघण्याचा जितका तडफडात करतोय तितकाच अजुन अडकतोय. तेवढ्यात झाडा समोर उभी असलेल्या लाल गाडीचा दरवाजा एका माणसाने उघडला. त्याला भरगच्च मिश्या होत्या आणि अंगाने तो चांगलाच बलदंड होता. हा माणुस इतक्या वेळ आपल्याच बाजुला उभा होता हे त्याच्या लक्षात आल. या माणसाला कुठे तरी आधी बघितल होत. गाडीत बसतांना तो अनिकेत कडे  बघुन उगाच हसला.  अनिकेतला कळेना तो माणुस का हसला ते कळेना. तो डोळे बारीक करुन त्या माणसाला बघायला लागला. ती लाल गाडी निघुन गेली. अनिकेतला परत तंद्री लागली. 'अमेरिकेला जायच काय करायच? मी पुढे जायच का, की पुढल्या वर्षी पर्यंत वाट बघायची. बरं, अमेरिकेला नाही गेलो तर आई-बाबा विचारणार, तर त्यांना काय उत्तर द्यायच? मेघनाच लग्न झाल्यावर तिला भेटण पूर्ण बंद होइल. किती दिवसां साठी? शी..आपणही निर्लज्जा सारख कोणाच्या तरी मरण्याची वाट बघत बसायच, गिधाडा सारख.&lt;br /&gt;"साहेब, पैसे" पोर्‍याने अनिचा हात धरुन हलवल.&lt;br /&gt;अनिने त्याला  पैसे दिले.  त्या पोर्‍याच्या कपाळावरच धगधगीत लाल गंध मजेशिर दिसत होत.&lt;br /&gt; 'आपण टेकडीवरच्या मंदिरात चक्कर मारायला हरकत नाही'&lt;br /&gt;पाउसही कमी झाला होता पण अजुन थांबला नव्हता.&lt;br /&gt;त्याने गाडीला किक मारली. पण गाडी रस्त्याच्या कडेवरुन अचानक घसरली आणि किक त्याच्या पोटरीवर सपकन बसली.&lt;br /&gt;अनिकेतने शिवी हासडली.&lt;br /&gt;"संभाल के भाऊ" झाडाखालुन कोणी तरी ओरडल. "रूक जाओ अभी. और एक चाय मार के जाओ"&lt;br /&gt;अनि ने लक्ष दिल नाही. तो मंदिराच्या रस्त्याला लागला.&lt;br /&gt;'बाबावर आपण एवढा विश्वास का टाकतोय याचा तो विचार करु लागला.&lt;br /&gt;'त्याच चुकल असेल तर कोणी मरायच नाहीच आणि मेघना दुसर्‍याशी लग्न करुन बसायची. म्हणजे मी घर का ना घाट का असा अधांतरी लटकत राहीन.'&lt;br /&gt;त्याला हे सगळे विचार नकोसे झाले होते. मंदिरात जाउन बर वाटेल अस त्याला वाटत होत.&lt;br /&gt;समोरचा गाडीवाला इतकी हळु चालवत होता. ते बघुन अनिकेतला राग आला. त्याने दोन-तीनदा हॉर्न वाजवला पण ती गाडी ढिम्म हलेना. शेवटी त्याने गती वाढवली आणि उजवीकडुन गाडी घातली. ती गाडी कोण चालवतय बघितल तर झाडाखाली उभा असलेला मुच्छड गाडी मंदपणे गाडी चालवत होता. त्याला बघण्याच्या भानगडीत अनिच्या समोरच्या दिव्याच्या खांबाकडे गेल नाही. रस्ता रुंदीकरण्याच्या  भानगडीत आधी रस्त्याच्या कडेला असलेले दिवे आता जवळपास रस्त्याच्या मधे आले होते.  शेवटच्या क्षणाला अनिने त्या खांबाकडे बघितल पण तो पर्यंत उशीर झाला होता.&lt;br /&gt;'म्हणजे एवढ सगळ करुनही तो मीच होतो' असा काहीसा विचार त्याच्या मनात वीजेसारखा चमकला आणि क्षणार्धात, पाखरु खिडकीच्या काचेवर आपटाव तसा तो खांबावर फाटकन आदळला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेघना, उठ बाळा ५ वाजायला आलेत. कधीची झोपलीयस. "&lt;br /&gt;मेघनाने डोळे खाडकन उघडलेत. तिच ह्र्दय धड-धड करत होत.&lt;br /&gt;"आई, परिणिता म्हणजे नक्की काय?" तिने घाबरत आईला विचारल.&lt;br /&gt;"म्हणजे?"&lt;br /&gt;तेवढ्यात मेघनाचा सेल वाजायला लागला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(क्रमशः)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हा भाग लिहायला बराच उशीर झाला त्या साठी क्षमा असावी. पुढल्या भाग या गोष्टीचा शेवटचा असणार आहे. श्री अंबरीश यांनी प्रत्येक भागाला उत्स्फुर्त प्रतिसाद दिल्याबद्दल मी त्यांचा आभारी आहे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-1131453448192315297?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/1131453448192315297/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=1131453448192315297' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/1131453448192315297'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/1131453448192315297'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='रेखांकित भाग ४'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-9129218267057371984</id><published>2009-11-02T07:19:00.000+05:30</published><updated>2009-11-02T07:19:00.263+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आगामी लेख'/><title type='text'>आगामी लेख</title><content type='html'>बर्‍याच दिवसात काही लिहिल नाही याच निमित्त धरुन लिहितोय. आगामी लेख या शीर्षका खाली लिहितोय खर पण  आगामी लेखात प्रकाशित झालेले लेख या सदरा अंतर्गतच बरेच दिवस तिठत  उभे आहेत. पण सध्या काही इलाज नाही. खुप काम आहेत त्यातुन पर्यटन बरच झाल त्यामुळे अजुनच कमी वेळ मिळाला. मधे आमचे आई-वडिल इथे आले होते त्यात व्यस्त होतो. बर्‍याच घटनांवर लिहायचा मानस होता पण तो मानसच राहिला. यावरुन लक्षात आल की सध्य परिस्थितीवर मी गेल्या बरेच दिवसात एकही लेख लिहिलेला नाही. कोणाच काही अडल नाही पण माझ इंग्रजी ब्लॉग फक्त सध्य-परिस्थितीवरच असतो आणि मराठी ब्लॉग त्याच विषयांवर पण मराठीत अश्या विचारानी सुरु केला होता. सुरुवातीला बरेच लेख लिहिलेही पण जसा जसा वेळ कमी मिळतोय तस फक्त कथाच लिहिल्या जाता आहेत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कथा कधी लिहिन अस वाटल नव्हत. अचानकच लिहायला सुरुवात केली आणि लिहितच गेलो पण नेहमी एक प्रश्नचिन्ह समोर असत, एक भिती मनात असते की जे लिहितो आहे ते वाचण्याजोग आहे का? जे मांडतो आहे, रंगवतो आहे किंवा निदान तसा प्रयत्न करतोय ते मनोरंजक आहे का? लोकांची नेमकी प्रतिक्रिया काय आहे हे कळण्याचे मार्ग ठळक नाही. मोजकी लोक प्रतिक्रिया टाकतात आणि ब्लॉगवर भेट दिलेल्यांची संख्या वाढतांना दिसते पण तेवढच. घरी आमचे वडिल बंधु आणि मातोश्री प्रत्येक लेखास प्रतिक्रिया नेमाने देतात. दोन मित्र नित्य-नेमाने लिहिलेल वाचतात.  या त्यांनी दिलेलं प्रोत्साहनची शिदोरी खुप वेळ पुरते हे मात्र खर. बरेच लोक म्हणतील कि लोकांच्या प्रतिक्रियांच काय लोणच घालायच आहे. आपल्याला आवडेल ते आणि मनाला रुचेल तस लिहित रहा. काही नाहीतर स्वतःच्या आनंदासाठी लिहि. विचार वाईट नाही पण स्वानंदासाठीच लिहायच तर दररोज डायरी लिहीली तरी पुरे आहे त्यासाठी एवढा ब्लॉग लिहायचा खटाटोप करून निरर्थक शब्दांच ओझ लोकांवर टाकण्यात काय अर्थ? काहीच नाही. खरच काही नाही. त्यापेक्षा न लिहिलेल बर किंवा न बोललेल बर. आमचे आजोबा त्यांच्या लहानपणीची गोष्ट सांगत की त्यांच्या काकांना जेवणाच्या पानावर भ्र काढलेलाही चालत नसेल. बोलायचच झाल तर "श्रीहरी श्रीहरी" एवढच म्हणायच. अजुन हव असेल तर स्वत: घ्याव. नियम फार कडक पाळल्या जात असे. पण मला कढी आवडली हे श्रीहरीच्या नादात सांगण थोड गंमतीदारच असणार.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भिती अशी वाटते की ब्लॉग लिहिण्याच्या भानगडीत वायफळ बडबड होत असेल तर ते कळणारच नाही आणि त्या नादात देवाचही नाव घेतल्या जाणार नाही.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-9129218267057371984?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/9129218267057371984/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=9129218267057371984' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/9129218267057371984'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/9129218267057371984'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='आगामी लेख'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-1137050957111136566</id><published>2009-09-23T08:27:00.000+05:30</published><updated>2009-09-23T08:27:00.240+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मनोगत'/><title type='text'>जगाच्या पाठीवर</title><content type='html'>लोकांकडे जेंव्हा मी बघतो तेंव्हा माझ मन एक वेगळाच खेळ खेळत असत. हा जो मनुष्य माझ्या समोर उभा आहे तो या स्थितीत कसा पोचला. समोर भिकारी असेल तर तो भिकारी कसा झाला? त्याचे आई-बाबा पण भिकारीच होते का? त्याच लहान पण कस गेल असेल? भिक मागण्यातच का? तो लहान असतांना समाज स्थिती कशी होती?  समोर चांगल्या पोषाखात कोणी उभा असेल तर त्याने तरूणपणात कुठले निर्णय घेतले असतील? की तो श्रीमंत घरात जन्मला होता आणि आयुष्यभर एक काडी इकडची तिकडे न करता तो ऐष करत जगला? अर्थात मी प्रत्येकाला जाऊन "तुम यहां पर कैसे पोहोचे?" अस विचारत नाही.  तसं करण थोड विनोदीच ठरेल पण अश्या दृष्टीने बघायला लागल की जग वेगळ्याच रंगात दिसायला लागत. माझ्या आजोबांच बालपण १९१० च्या दशकात गेल. तेंव्हा वीज नव्हती, विमान नव्हती आणि इंटरनेटही नव्हत. पण त्यांच्या मृत्युच्या आधी त्यांनी सगळं बघितल. त्यांच्या लहानपणी लोकमान्य टिळक भारतीय स्वातंत्र्य लढ्याच नेतृत्व करत होते तर ते जायच्या वेळी कॉंग्रेस पक्ष गांधी घराण्याची वैयक्तीक मालमत्ता झालेल होत. त्यांच्या लहानपणी जात-पात मानल्या जात असे तर त्यांच्या हयातीत दलित व्यक्ती भारताचा राष्ट्रपती झालेला होता. वैयक्तीक तसच सामजिक पटलावर एवढा प्रचंड बदल घडलेला होता की जर का त्या पिढीला बोलत केल तर इतिहासाच एक आगळ-वेगळ  दालन उघडेल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामाजिक बदलांना आपण सध्या बाजुला ठेउया.  तो वेगळा विषय ठरेल. वैयक्तिक पातळीवर विचार केला तर प्रत्येक व्यक्ति स्वतःतच एक कथा असते. काही कथा रोमांचक असतात तर काही भीषण असतात. काही अगदीच सपक असतात तर काही स्फुर्तीदायक असतात. पण या कथाच जगाला रंग देतात. जगात करोडो लोक निवास करतात. मला नेहमी वाटत की कृष्णाने विश्वरूप म्हणजे नेमक हेच दाखवल आणि अर्जुनासारखा पुरुष ते बघुन घाबरला. आपण सामान्य जन हे भीषण रूप बघण्याच्या लायकीचे नसतो आणि  अनभिज्ञपणे आपल आयुष्य कंठत असतो. जगाच सोडा, आपल्या आजु-बाजुला, ओळखीचे आणि नुसते तोंड देखले ओळख असलेल्यां पैकी किती लोकांबद्दल आपल्याला माहिती असते. काही यशस्वी असतात आणि अपयशी. पण कुठलाच व्यक्ती अपयशाची अपेक्षा ठेवत नाही. आणि प्रत्येकातच यशस्वी होण्याची कुवत नसते. म्हणुनच व्यक्तीमत्वे प्राप्त आकार घेतात. प्राप्त परिस्थितीत आणि घेतलेल्या निर्णयांच्या परिणामांच्या चौकडीत प्रत्येक मनुष्य जगण्याचा प्रयत्न करत असतो. मूळ स्वभाव बदलत नाही हे जरी मान्य तरी मनुष्य स्वभावाच्या ज्या विविध छटा दिसतात त्यात सोबतीच्या लोकांचे पडसाद आणि आजुबाजुच्या जगाची छायेतच वावरतो.मनुष्य घडविण्यात इतक्या सार्‍या घटना सामिल असतात की त्या व्यक्तिला सुध्दा बर्‍याचश्या गोष्टींची कल्पना नसते. पण लोकांना बोलत केल तर त्यांच्या आयुष्याचीच नव्हे तर त्यांच्या आजु-बाजुच्या परिस्थितीचे चित्र स्पष्ट होत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपण आपल्यातच इतके गुंग असतो की जगाला आपण एका विशिष्ट चौकडीत बांधुन टाकतो. ज्या आकलनी पडतात त्यांना आपण स्वतःला मध्यबिंदु ठरवुन विभाजित करतो. हा व्यक्ती माझ्या पेक्षा हुशार आहे त्यामुळे त्याच यशस्वी होण सहाजिकच आहे. तो जर का अपयशी ठरला तर आपण हसतो. या व्यक्ती पेक्षा आपण हुशारच होतो त्यामुळे आपल यशस्वी ठरण सहाजिकच आहे आणि जर का तो यशस्वी ठरला तर नशिब साल्याच! ज्या गोष्टी आकलनाच्या पलिकडे असतात त्याचा आपण विचारच करत नाहीयात यशापयाशाच्या व्याख्या सुध्दा स्वतःला माप-दंड ठरवुन आपण आखतो.  या सगळ्या खेळात मी महत्त्वाचा. शिवा-शिविच्या खेळात मीच दाम देणार आणि मीच पळणार. गमतीदारच प्रकार आहे थोडा पण सगळेच खेळत असतात म्हणुन कोणी कोणाला विचारत नाही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपण समाजात राहुन, स्वतःला सामाजिक प्राणी म्हणवतो आणि आयुष्यभर समाज विन्मुख जगतो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यावर उपाय काय मलाही माहिती नाही. जागतिकीकरणाच्या अर्थशास्त्रानुसार आज जग एकामेकांवर अधिकाधिक अवलंबुन रहाणार आहोत. थोडक्यात आपल्याला एकामेकांच्या आयुष्यात डोकावुन बघावच लागणार. पण प्रत्यक्षात परिस्थिती विपरितच आहे. बारकाईने बघितलत तर आपण एकामेकांपेक्षा अजुन दूर जातो आहोत हेच ध्यानात येत.  खरतर आजच्या काळात प्रसारण माध्यमांचा इतका सुळसुळाट झाला आहे की  जगाच्या कानाकोपर्‍यातल्या प्रत्येक लहान्-मोठ्या घटनेला जगभर प्रक्षेपित केल्या जात. जग लहान होण्याचे परिणाम मात्र विपरीतच होतो आहे. पराकोटीला गेलेली प्रत्येक वस्तु धुळीसच मिळते त्या प्रमाणे अधिकाधिक माहिती उपलब्ध होण्याचे परिणाम, माहिती मुळीच उपलब्ध नसण्यासारखेच आहे. जगात असलेल्या पीडांचा, ज्यांच्यावर गुजरत नसते त्यांना मुळीसुध्दा फरक पडत नाही, किंवा ती लोक मुळीच फरक पडुन घेत नाहीत. यात प्रसार माध्यमांची सुध्दा बरीच चूक आहे.  उपलब्ध बातम्यांतुन जणु ही माणुसकीच गाळुन टाकतात आणि रहाते फक्त बातमी. इतके-इतके मेलेत, मग ते वाहुन गेलेत काय किंवा बंदुकीनी कोणी मारलेत काय किंवा सगळ्यांनी आत्महत्या केली काय, एकच आहे.सगळ्यांनी उठुन बाबा आमटे बनाव अस माझ म्हणण मुळीच नाही पण जगाकडे माणुसकीच्या दृष्टीकोणातुन थोडं मायेने बघितलआणि संवाद साधला तरी पुरेसे आहे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-1137050957111136566?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/1137050957111136566/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=1137050957111136566' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/1137050957111136566'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/1137050957111136566'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/09/blog-post_23.html' title='जगाच्या पाठीवर'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-388072579459201718</id><published>2009-09-14T08:28:00.000+05:30</published><updated>2009-09-14T08:28:00.584+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दीर्घकथा'/><title type='text'>रेखांकित भाग ३</title><content type='html'>ताप उतरल्यावर लगेच मेघनाला घरी आणल. ताप सोडला तर बाकी सगळ ठीक होत पण तिने ताप चांगलाच अंगावर काढला होता. तिल घरी येऊन एक आठवडा व्हायला आला होता तरी तिचा थकवा काही जायच नाव घेत नव्हता. घरच्यांपुढे एक महत्त्वाचा प्रश्न असा होता की तिला अचानक एवढा फणफणुन ताप यायला झाल काय? डॉक्टरांनाही काहीच कळेना. शहरात कुठली साथ वगैरे सुध्दा सुरु नव्हती. अजुन काही कमी असेल तर घरी आणल्यापासुन मेघना पहिल्यासारखी वागत नव्हती. नुसती शांत बसुन असायची. तशी ती फार बोलकी होती अस नाही पण तिने आता एकदम अबोला धरला. तिच तापातल असंबंध बोलण बघुन डॉक्टरांनी काही मानसिक तर दुखण नाही ना याची चौकशी केली होती. त्यामुळे तिच्या आई-वडिलांची काळजी अजुन वाढली&lt;br /&gt;जसलीनच जाण-येण वाढल होत. एकदा मेघनाच्या आईने तिला विचारल की काय चाललय म्हणुन पण तिच्याकडुनही फारस काही बाहेर आल नाही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अनिकेत कुठे असतो आजकाल?" मेघनाने विचारल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"माहिती नाही मला पण तुम्ही दोघेही अमेरिकेला जायची तयारी करताय ना? त्यातच गुंग असेल तो." जसलीन उत्तरली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जणु काही घडलच नाहीया अस त्या दोघी बोलत होत्या. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"का ग तुझ्याकडे त्याचा फोन नंबर नाही या का? कि मी देउ तो?" उगाच खौटपणे ती पुढे बोलली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोडा वेळ कोणीच काही बोलल नाही. मेघना नख खात होती आणि जसलीन पुस्तक चाळायला लागली. "खुप उकडतय. पाऊसही पडत नाहीया. पावसाची चाहुल लागताच वीज जाते. पंखे बंद" जसलीन गरमीने त्रस्त झाली होती. आकाशात ढगांनी गर्दी केंव्हाची केलेली होते. मुहुर्ताची वाट बघत त्यांनी वार्‍याचा व्यवहार थांबवला होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"फोनवरही तो इतका तुटक-तुटक बोलतो की काही न बोलल्यासारखच असत. जे विचारल तेवढ उत्तर देतो. 'कसा आहेस?' तर उत्तर येत. 'छान' आणि मग शांतता. 'मी कशी आहे विचारणार नाहीस का?'  तर उत्तर येत की 'कशी आहेस?' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आता काय करू सांग" मेघना म्हणाली.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"त्याच्या डोक्यात काय चाललय मला नाही माहिती पण विचार कर तुला कोणी सांगितल की तुझा मृत्यु अटळ आहे वगैरे तर काय बितेल तुझ्यावर?  मला तर कल्पना करणही अशक्य आहे" जसलीन म्हणाली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" आणि माझ्यावर काय बितते आहे हे तुल दिसत नाही हे बरय. माझ्य नशिबि तो मरणार आहे. माझ नशिब फत्थर आहे. मी नाट आहे. मी नसती तर तो सुखात असता. मी नसती त्याच्या आयुष्यात तर त्याला..." मेघना एकदम शांत झाली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"...तर त्याला आयुष्य होत" अस म्हणत ती रडायला लागली. "पण तो भेटत का नाहीया? मला आता राग येतोय त्याचा" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"किती वेळा सांगितल की तोच-तोच विचार मनात घोळवु नकोस. म्हणुनच तू बरी होत नाहीयास. तुझा थकवा जात नाहीया. आणि वा, तुला त्याचा राग येतोय! छान! " मग काही क्षण थांबुन जसलीन पुढे म्हणाली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मला माहिती नाही की मी हे तुला सांगायला हव की त्यानीच तुझ्याशी बोललेल बर पण तु हॉस्पिटल मधे असतांना मी त्याला बाबा बद्दल सांगितल. त्या नंतर तो बाबा ला स्वतः भेटायला गेला होता. बाबाने त्याला काय सांगितल मला नाही माहिती पण तो त्यांनंतर अजुन काही भविष्य सांगणार्‍यांकडेही गेला होता." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मग?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मला त्याने फारस सांगितल नाही. पण तो एवढच म्हणाला.." जसलीन बोलायच थांबुन गेली &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघना डोळे विस्फारुन करुन तिच्या बोलण्याची वाट बघत होती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तोच सांगेल तुल पुढच" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आत्ता पर्यंत का लपवलस? सांग काय म्हणाला तो" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेघना" अस म्हणत जसलीननी मोठ्ठा श्वास सोडला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तो एवढच म्हणाला की कोणीच त्याला भविष्य सांगायला तयार नाही. सगळ्यांनी त्याला परतावुन लावल." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेवढ्यात मेघनाचा सेल वाजला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अनि येतोय" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बर, त्याला सांगु नकोस की मी तुला काही सांगितल म्हणुन" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हो" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मी निघते. काळजी घे. काकु विचारत होत्या सारख की मेघनाच काय चाललय म्हणुन" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तु काय सांगितलस?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मी काय सांगणार. पण तू त्यांना अनिकेत बद्दल सांगुन टाक लौकर. अजुन उशीर करून काय होणार." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काय सांगणार, दगड" मेघना पुटपुटली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बघ, झाली सुरुवात परत. इतक्या दिवसांनी भेटतोय तर थोडा प्रसन्न चेहर्‍याने स्वागत कर त्याच. तो चांगल्या मुड मधे नसणार॑"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"जसलीन, तू अजुन काही तरी लपवतेयस माझ्यापासुन" मेघना भुवया वर करत म्हणाली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काही गोष्टी मी न सांगितलेल्या बर. आणि काही गोष्टी त्यानेच तुला सांगितलेल्या बर्‍या, मी मधे पडण बरोबर नाही" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघना काहीच बोलली नाही. अनिकेत आल्यावर काय बोलाणर होणार या विचारात तिच मन धाव-पळ करत होत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जसलीन गेल्यावर दहा मिनिटातच दाराची घंटी वाजली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"घरी कोणी नाहीया का?" अनिकेतने घरात पाऊल ठेवताच विचारल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नाही" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो खिडकीजवळ जाऊन बाहेर बघु लागला. त्याने नेहमीप्रमाणे खिशात हात घातले होते. "कुठे गेलेत सगळे?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"घरातल्यांना भेटायच असेल तर नंतर ये. आत्ता फक्त मीच भेटु शकते" ती त्रस्तपणे उत्तरली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनिकेतने घरात जणु डाव्या पायाने आला होता. आल्यापासुन अनिकेतच तिच्याकडे मुळीच लक्ष नव्हत हे बघुन मेघना आतल्या आत धुमसायला लागली होती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मी काही खाणार नाहीया तुला" ती फणकारली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"किती गोड स्वागत करतेयस माझ. मला एकदम छान वाटतय बघुन" अनिकेत तुटक्या आवाजात मागे वळुन म्हणाला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"इतक्या दिवसांनी भेटलास, विचारल तरी का की मी कशी आहे ते"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"किती वेळ झाला मला घरात पाऊल ठेवुन?" अनिकेत मनगटावरच घड्याळ तिच्या समोर नाचवत म्हणाला. तोही पेटला होता. " जेमतेम चार मिनट झाली असतील. आणि तुझा सुंदर मुखडा बघुन कुठुन इथे आलो अस झालय मला" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मग आलाच कशाला? फोनवरच तुझ बोलण पुरत मला" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेघना, डोक चरायला गेलय तुझ" अनिकेत दात-ओठ खात म्हणाला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अस बोलायच असेल तर जा तू इथुन"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनिकेत ने काहीच उत्तर दिल नाही. तो खिडकीतुन परत बाहेर बघायला लागला. काही क्षण असेच गेलेत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नको ना भांडुस असा" मेघना काकुळतेने म्हणाली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोघांनांही असली भेट अपेक्षित नसावी. कसल्यातरी विचारात दोघेही मग्न झालेत. कोणीच काहीच बोलेना. इतक्या दिवसांची भेट अस रूप घेइल अस तिला वाटल नव्हत. तिला अनिकेतला घट्ट मिठी माराविशी वाटत होती. त्यानी आपल्याला कुशीत घ्याव आणि लाड करावे अशी तिची अपेक्षा होती. पण तस काहीच घडल नाही. अवघडल्यासारखे दोघे भेटलेत आणि एकामेकांवर निखारे बरसवत होते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगापासुन मुहुर्ताला खोळंबलेला पाऊस शेवटी पडायला लागला. इतका वेळ दाटुन आल होत पण पाऊस जोरात पडत नव्हता. थेंबांची एकच रीघ संथपणे पडत होती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मेघनाकडे न बघताच त्याने विचारले, "राणी तू कधी आरश्यात स्वतःला बघितल आहेस का?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघनाला कळेना तो थट्टा करतोय कि खरच विचारतोय. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"म्हणजे?" तिने चाचपडत विचारल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"वाघाचे पंजे, कुत्र्याचे कान आणि तुझ लग्न शुभ मंगल सावधान" तो हसत म्हणाला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काय बोलतोयस अनि?" मेघनाला तो काय बोलतोय अजुनही कळेना. त्याच ते हसण विक्षिप्त होत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुला मातीचा वास येतोय का?" अनिकेत तंद्रि लागल्यासारखा बोलत होता. "पाऊस पडायला लागला की लोक वेगळेच वागयला लागतात. एकदम ताजे-तवाने दिसायला लागतात. त्यांच्या नकळत. आणि पावसा नंतर सगळीकडे चिखल आणि घाण होत असली तरी पाऊस निदान आधीची घाण वाहुन घेऊन जातो. नाहितर नविन घाणीला जागा कशी मिळणार? हे चक्र सदैव चालू असत. कधीही न संपणारा शिवा-शिविचा खेळ. निसर्गाच्या प्रत्येक चालीत हा खेळ दिसतो." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काही क्षण तसेच गेलेत. मेघनाच्या मनात शुन्य होत तर अनिकेतच्या मनात विचारांची धांदल उडाली होती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुला मातीचा वास आवडतो का सांगितल नाहीस?" तो अजुनही मेघनाकडे बघायला तयार नव्हता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हो" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मला खुप-खुप आवडतो. नव-निर्मितीचा वास असतो तो" त्याने पहिल्यांदा मेघनाकडे वळुन बघितल. "बाकी माझी बडबड सोड,  पण मी हा वास खुप मिस करणार आहे" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघनाला त्याच्या अगम्य बोलण्याचे चटके जाणवायला लागले होते. अनिकेतला तत्त्वज्ञान वाचण्याची आवड होती आणि तो बर्‍याचदा आपल्याच धुंदित बोलत असे. पण असल आत्यंतिक आणि अधांतरी तो कधी बोलला नव्हता. तो हळु-ह्ळु निखारे शिलगवत होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अस काय बघतेस?, भूत बघितल्या सारख." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मला घाबरवु नकोस अनि" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्याच्या बोलण ऐकुन  आपण गेले आठवडाभर मी-मी चा घोष लावलाय आणि आपल्या नशिबिचा खरा भोग अनिकेतला आहे या जाणिवेचा साप तिला पहिल्यांचा डसला. परिस्थिती अजुन बिकट होत होती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुला माझी भीती वाटायला लागली. मी अजुन भूत झालो नाहिया राणी!" अस म्हणुन तो जोरात हसायला लागला. "पण लौकरच"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो परत उठुन खिडकी जवळ गेला. त्याच्या अंगात कसल तरी भूत संचारल होत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सुर्यास्त बघायला तुला आवडतो का? मी पण मगापासुन हे आवडत का ते आवडत का, अस बावळटासारख विचारतोय. सगळ्यांनाच सुर्यास्त बघायला आवडतो. पण का आवडतो माहितीय? कारण, सगळ्यांना माहिती असत की दुसर्‍या दिवशी सुर्योदय होणार आहे.  अस समज की सुर्योदय होणारच नाहीया आणि आत्ताचा समोरचा सुर्यास्त शेवटला आहे, मग कस वाटेल? डोळे भरून सुर्यास्त बघशील की डोळे भरून रडशील?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अनि, अस विचित्र नको बोलुस. मला भीती वाटतेय. अस काहीही होणार नाहीया. आपण यातुन मार्ग काढणार आहोत ना? अस काय करतोस? तूच तर म्हणाला होतास ना हॉस्पिटल मधे की काही तरी करू म्हणुन मग आता अस का बोलतोयस?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनिकेत नी पहिल्यांदा तिच्या कडे वळुन बघितल. "तू जसलीनशी बोललीस ना मगाशी. परत सांगु का काय झाल ते?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नको. माहितीय मला. मला नाही इच्छा ऐकायची." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुझ्या लक्षात येतय का मेघना की तू अशी वागतेयस की त्रास फक्त तुलाच होतोय" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नाही अनि, अस नको म्हणुस, प्लीज" ती रडवेल्या सूरात म्हणाली. "तुझ्यावर का बितते आहे याची मला कल्पना.." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेघना, मला मीच आरश्यात दिसत नाही." मेघनाच वाक्य कापत तो तिच्या जवळ आला. त्याचे डोळे भरून आले होते. ते बघुन मेघनाला भडभडुन आल. तिने केविलवाणा असह्य हुंदका दिला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" मला माझ प्रतिबिंब दिसत पण त्यात बिंब नसत. जणु शरीराची प्रतिमा आहे पण त्यात जीव नाही. मी कितीही आरडा-ओरडा केला तरी ते तसच निश्चल आणि निर्जिव उभ रहात. माझ बिंब शेवटल मावळतांना बघण्याची अगतिकतका माझ्या नशिबी आलीय" अस म्हणुन तो उठला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" नको जाऊस कुठे आत्ता" तिने त्याचा हात घट्ट धरला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मला खुप भीती वाटतेय मेघना. पण यातुन काही मार्ग नाही. मला एकट सोड आणि तू तूझ्या मार्गाने जा. तुझ्या समोर मार्ग आहेत. माझे संपलेत." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अनि, तु हॉस्पिटल मधे खोट बोललास माझ्याशी"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेघना, काय खर आणि काय खोट? बोललो मी खोट, काय करणार आहेस? कोणी माझ काही बिघडवु शकत नाही" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पण तू म्हणालास की काही तरी मार्ग काढु" मेघना खुळ्यासारखा तो पदर काही सोडत नव्हती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुला परिस्थिती कळतेय का मेघना? काय मार्ग-मार्ग लाउन बसलीयस. तो शब्दसुध्दा थोडा कॉमेडीच वाटतोय. कुठल्या जगात वावरतेयस राणी? जागी हो. बघ माझ्याकडे एकदा. नंतर दिसणारसुध्दा नाही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मार्ग, डोबंल मार्ग, त्याची तर..." अस म्हणत त्याने शिवी हासडली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बघ, माझे हात? बघ..." अनिने हाताचे पंजे तिच्यासमोर नाचवले. "पांढरे फटक आहेत. काहीच रेखाटलेल नाहीया. रस्त कड्यावरून कोसळुन नाहीसा व्हावा तसा मी माझ्या हातावरच्या रेषांच्या गर्तात नाहीसा होणार." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्याने मान टाकली. "मला मरायच नाहीया मेघना. अजुन काहीच केल नाही, काहीच बघितल नाही. असा कसा चालला जाउ. आई-बाबांना, मित्रांना, तुला टाकुन कसा जाऊ. हा कसला घाणेरडा खेळ चाललाय.." त्याच्या तोंडुन शब्द फुटेनासे झालेत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विसर मला..." अस तो कस तरी म्हणत धावत निघुन गेला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघना उशीत डोक घालुन एकटीच असह्य रडत बसुन राहिली. पण तिच्या डोक्यात अचानक काही तरी पेटल. ती दार उघडुन धावत खाली अनिकेत ला थांबवायला गेली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अनि" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेघना, काय करतेयस, लोक बघतायत" तिचा अवतार अणि आवेश बघुन अनिकेत म्हणाला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तु चल वर परत" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनि काही बोलायच्या आधीच ती म्हणाली "माझ्याकडे एक आयडिया आहे" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(क्रमशः)  &lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;श्री अंबरीश यांनी हा भाग लिहिण्यास मदत केल्याबद्दल मी त्यांचा आभारी आहे.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-7773044833099414496</id><published>2009-08-20T08:57:00.001+05:30</published><updated>2009-08-20T08:57:00.292+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी रचना'/><title type='text'>झांशीवाली रानी</title><content type='html'>सिंहासन् हिल उठे, राजवंशो भुकटी तानी थी।&lt;br /&gt;बुढे भारत मे भी आई, फ़ीर से नई जवानी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहेचानी थी।&lt;br /&gt;दुर फिरंगी यो करनी की, सबने मन मे ठानी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चमक उठी सन् सत्तावन मे वह तलावार पुरानी थी।&lt;br /&gt;बुन्देल हरबोलोन् के मुह, हमने सुनी कहानी थी।&lt;br /&gt;खुब लढी मर्दानी वो तो झाशी वाली रानी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रानी गयी सीधार चिता अब उसकी दीव्य सवारी थी।&lt;br /&gt;मिला तेज से तेज, तेज की वही सच्ची अधिकारी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी उम्र कुल तेईस की थी, मनुज नही अवतारी थी।&lt;br /&gt;हम को जीवित करने आयी बन स्वंतत्रता नारी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिखा गयी पथ, सिखा गयी हमको जो सीख सिखानी थी।&lt;br /&gt;बुन्देल हरबोलोन् के मुह, हमने सुनी कहानी थी।&lt;br /&gt;खुब लढी मर्दानी वो तो झाशी वाली रानी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;--- सुभद्राकुमारी चौहान&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-7773044833099414496?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/7773044833099414496/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=7773044833099414496' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/7773044833099414496'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/7773044833099414496'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='झांशीवाली रानी'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-5831824400253474644</id><published>2009-07-22T08:28:00.000+05:30</published><updated>2009-07-22T08:28:00.284+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दीर्घकथा'/><title type='text'>रेखांकित भाग २</title><content type='html'>परतीच्या वाटेवर दोघीं पैकी कोणीच काहीच बोलत नव्हत. जसलीनला कळत नव्हत की स्वत:च्या लग्नाची चिंता करावी की मेघना बद्दल जे ऐकल त्या बद्दल तिच्याशी बोलाव. मेघना सुन्नपणे गाडी चालवत होती. तिला खर खुप रडावस वाटत होत, ओरडावस वाटात होत पण तिच मन दगडासारख निश्चल  पडलेल होत. जे घडल, जे ऐकल ते सगळ एक अघोरी स्वप्न आहे आणि यातुन कधी जागं होउ अस तिला वाटत होत. बाबाने सांगितलेल सगळ खोट आहे अस ती सारख घोकत होती. पण बाबाला खोट बोलुन काय मिळणार होत? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघनाने जसलीनला घरी सोडल आणि ती आपल्या घरी आली तर कोणीतरी पाहुणे बसले होते.&lt;br /&gt;"हि आमची मुलगी, मेघना" मेघनाच्या आईने ओळख करून दिली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"माझ्या लहानपणी आम्ही शेजारी होतो. खुप खेळायचो. आज खुप वर्षांनी भेटतोय. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघनाने दोघांना नमस्कार केला आणि पटकन आत निघुन गेली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अग, चहा करतेस का?" आईने हाक दिली. मेघनाने काहीच उत्तर दिले नाही पण कपडे बदलुन चहाच आधण ठेवल. तिला खुप थकल्यासारख वाटत होत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेवढ्यात आई आत आली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अग, चहा कर म्हटलेल ऐकलस का?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हो" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बर वाटत नाहीया का? ऊन लागल का?" तिचा पडलेला चेहरा बघुन आईने थोड काळजीने सुरात  विचारल.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नाही. बरं आहे" मेघना कसबस म्हणाली. तिला आता मळमळल्या सारख वाटत होत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"चहा घेउन आलीस तर थोडी बस बाहेर थोडी. बोल त्यांच्याशी" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मला कस तरी होतय" मेघना हळुच बोलली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बघ आत्ताच म्हणालीस बर वाटतय आणि आता म्हणतेस की बर नाही वाटत. चेहरा कोमेजुन गेला आहे. कशाला गेलीस उन्हात? थंडीतलही दुपारच ऊन बाधत बाळा" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आई बोलतच होती तर मेघनाला पाय जड झाल्यासारखे वाटायला लागल आणि अंगात थंडी भरली.  तिने भिंतीचा आधार घेतला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेघना" अस म्हणत आईने तिला सावरायचा प्रयत्न करू लागली. "अग काय होतय पोरी?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघनाला सगळ भोवती गरगर फिरतय अस वाटु लागल. तिने थंडगार फरशीवर अंग टाकल. हात-पाय शिथिल पडले होते. शरीरापासुन दूर जातोय असा तिला भास व्हायला लागला.  अंगात मुळीच म्हणजे मुळीच त्राण नव्हता. हळु-हळु कमी ऐकु येऊ लागला. कानात एकच असा कुं आवाज फिरु लागला. मेघनाला अचानक आठवल की कोणीतरी दूरच्या काकाला कमी ऐकु यायच आणि तो सगळ्यांना सांगायचा कि त्याला कानात ओमकारच ऐकु येतो. तिला मनात खुदकन हसु आल.  आजु-बाजुच्या सगळ्या गोष्टी संथ झाल्या होत्या. आई सावरायचा प्रयत्न करत होती. बाहेरच्या पाहुण्यांना आईने हाक मारली असावी कारण त्या काकु वाटीतुन तोंडावर पाणी मारत होत्या. फारच थंड होत पाणी. तिला काय चाललय याची पूर्ण कल्पना होती पण शरीराने जणु साथ सोडायची झटापट लावली होती. तिने डोळे मिटले. तिला वाटल झोप लागेल पण झाल विपरीतच. दगडासारख निपचित पडलेल मन चुळबुळ करायला लागल. तिच्याशी भांडायची तयारी करायला लागल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डोळ्यासमोर सारखा बाबा फिरु लागला. "जिसकी तुम परिणिता बनोगी उसकी मृत्यु अटल है।" याचा अर्थ काय? परिणिता म्हणजे नेमक काय? यातुन काहीच मार्ग निघु शकत नाही का? गोष्टींमधे तर नेहमी ऐकतो की व्रत-वैकल्य केलं की सगळ छान होत? मला वैकल्य म्हणजे काय हे सुद्धा नेमक माहिती नाही, मी कसली डोंबलाच व्रत-वैकल्य करतेय. पण त्याला काही तरी शब्द आहे. उ:शाप की अस काहीस म्हणतात. हो, बरोबर, उ:शापच. मला उ:शाप कोण देणार? गोष्टींमधे शाप देणाराच उ:शाप देतो. पण मला शाप कोणी दिला? काय चुकल माझ? कोणाच काय बिघडवल मी? मग कोणीच शाप न देता मी शापीत कशी?; तिला शापित शब्द नकोसा झाला. ज्वाळेसारखा तो शब्द तिला चटके देत होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ती डोळे उघडायचा प्रयत्न करू लागली. आपण नेमके कुठे आहोत ते तिला कळेना. आई अंधुकशी समोर दिसत होती आणि अंग भट्टीसारख तापल्याची तिला पहिल्यांदा जाणीव झाली. कपडे ओले-चिंब झालेले होते. घशाला कोरड पडली होती. तिने पाणी म्हणण्याचा बराच प्रयत्न केला पण तिला तोंडातुन भ्र काढण जमेना. आई काहीतरी बोलत होती पण ते तिला नीटस ऐकु येत नव्हत. अनिकेतच्या आठवणीने ती परत कासाविस झाली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;' अनिकेत कुठेय? जेंव्हा गरज असते तेंव्हाच तो नेहमी गायब होतो. किती आठवण येतेय त्याची. कुठेय तो? इथे मला जीव नकोसा झालाय आणि तो मस्त भटकत असेल. मित्रांसोबत चहा पित उभा असेल कुठल्य तरी चौकात. अस काय करतो तो? माझी काळजी नाहीया का त्याला?' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेवढ्यात आईने चमच्याने पाणी पाजल. मेघना ने डोळे मिटले. अंगाचा ज्वर कमी झाल्यासारखा तिला वाटु लागल पण अनिकेतच्या आठवणीने मनातले निखारे आत्ता खरे शिलगु लागले होते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'काय सांगायच त्याला?  तो आधी थट्टेनी उडवुन लावेल मग त्याला सगळ पटवुन कस द्यायच? आणि समजावुन तरी काय सांगणार? त्याची झाले नाही तर मी जगु नाही शकणार आणि त्याची झाले तर तो नाही जगणार. कसला अभद्र खेळ मांडळाय दैवाने. दैवानेच शाप दिलाय मला, आता गार्‍हाण तरी कोणापुढे मांडणार? &lt;br /&gt;'कालकूट विष को मन मे ही धारे रहो।"  बाबा परत डोळ्यापुढे नाचु लागला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'समुद्र मंथनातुन कालकूट विष निघाल म्हणतात आणि जगाला वाचवायच्या भानगडीत शंकर बळी चढला. पण त्यासाठी त्याला पार्वतीचा त्याग करावा लागला नाही. पार्वतीला सोड आणि कालकूट प्राशन कर अशी अट घातली असती तर त्याने काय केल असत?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कसले भन्नाट विचारांनी घोंगा घातलाय डोक्यात.' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिला स्वतःपासुन कुठे तरी दूर पळुन जावस वाटत होत.  'तिला अनिकेत डोळ्यासमोर दिसु लागला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नेहमी खिशात हात घालुन फिरत असतो. स्मार्ट दिसतो अस त्याला वाटत, बावळट.'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"उसकी मृत्यु अटल है।" बाबाचे शब्द तिला परत आठवले. तिचा जीव कासाविस झाला. तिने डोळे उघडण्याचा परत प्रयत्न केला. समोर अंधार होता. ती अजुनच घाबरली. दिसण सुध्दा बंद झाल कि काय? मग तिच्या लक्षात आल की रात्र झाली असावी. समोर आई दिसत नव्हती. आता अंग तेवढ भाजत नव्हत पण घशाला कोरड पडली होती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आई" मेघनाने हाक दिली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाजुलाच बाकावर झोपलेली आई खडबडुन जागी झाली. तीने दिवा लावला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेघना, कस वाटतय बाळा?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिव्याचा मंद प्रकाशही तिला असह्य होत होता. तिने त्रस्तपणे दिव्याकडे बघितल.  आईने लगेच दिवा मालवला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पाणी हव का बाळा?"  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघनाने डोळ्यानीच होकार दिला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आई तिला चमच्याने पाणी पाजु लागली. तेवढ्यात नर्स खोलीत आली. तिने नाडी तपासली. खर्ड्यावर काहीतरी लिहिल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काळजी करु नका ताई. ताप उतरतो आहे. "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपण हॉस्पिटल मधे आहोत हे मेघनाला आत्ता लक्षात आल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बराच घोटाळा केला म्हणजे आपण.'  अस स्वत:शीच बोलत तिने परत डोळे मिटले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"किती घोर लावलास मेघना" आई अस काहीस म्हणत होती पण मेघना मनाच्या गुहेत नाहीशी झालेली होती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"जो होना है उसे होने दो, उससे खिलवाड मत करो" बाबा परत डोळ्यासमोर बाहुली सारखा नाचु लागला. 'अरे, अस कस होऊ देऊ? अस असत तर कधीच काहीच करायची गरज नको. सगळ विधिलिखित आहेच. अभ्यासही करायला नको कारण पास व्हायच तर पास होणारच आणि फेल व्हायच तर अभ्यास करुनही फेलच होणार. यातुन काहीतरी मार्ग काढावाच लागणार. वाट्टेल ते झाल तरी चालेल. दैव गेल खड्ड्यात! बघतेच काय करत दैव ते. त्याने त्याची चाल खेळली आता मी माझी खेळणार"  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या विचाराने मेघनाला बर वाटल. तिल हळु-हळु शांत झोप लागली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोणीतरी हातावरून हात फिरवल्याचा तिला भास झाल. तिने डोळे उघडलेत समोर जसलीन बसली होती. दाराशी अनिकेत उभा होता. मेघनाने डोळे उघडलेले बघुन जिन्सच्या खिशात हात घालुन तो पलंगाजवळ आला. डोळे बारीक करत तो हसला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कस वाटतय?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ते ऐकुन मेघनाला अजुनच छान वाटायला लागल. काहीतरी मार्ग नक्कीच निघणार याची तिला पक्की खात्री पटली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मला माहितीय सगळ. आपण काहीतरी विचार करु"  तो शांतपणे म्हणाला. जणु तो तिच्या मनातलच बोलला. तिच्या मनात पेटलेल्या ज्वाळेत तो ही तितकाच होरपळला होता.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-5831824400253474644?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/5831824400253474644/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=5831824400253474644' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/5831824400253474644'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/5831824400253474644'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='रेखांकित भाग २'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-2013499919047394097</id><published>2009-06-20T05:02:00.002+05:30</published><updated>2009-06-20T06:18:18.614+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आगामी लेख'/><title type='text'>आगामी लेख</title><content type='html'>भारत - एक शोध (लेख मालिका)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिव-राज्यारोहण भाग ३&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेखांकित भाग २&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जय महाराष्ट्र भाग २&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेख बरेच आहेत लिहायला आणि माझ गप्पा मारण काही थांबत नाही. त्यातुन या महिन्याच्या शेवटी परदेशी जायचा योग आला आहे त्यामुळे लेखन संपूर्णतः बंद असणार आहे. तेंव्हा हे लेख नेमके कधी प्रकाशित होणार मलाच माहिती नाही. काम थोडी शिस्तीत करायला शिकायला हव. परदेशात काही सुचल तर ते नक्कीच प्रकाशिक करीन. प्रवास वर्णन लिहिणार अस तर वाटत नाही पण प्रवासाच्या योगाने काही सुचल तर बघु.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जय महाराष्ट्र याचा दुसरा भाग लिहिण्याचा मी बरेच दिवस प्रयत्न करतोय पण प्रत्येक वेळेस एखादा उतारा लिहिला की आधी लिहिलेला उतारा खोडावा लागतो.बहुधा विषयच असा आहे कि सगळ्यांचीच द्विधा मनस्थिती होत असावी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असो. प्रकाशित लेखनावर वाचकांनी प्रतिक्रिया द्यावी ही विनंती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपला,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिन्मय 'भारद्वाज'.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-2013499919047394097?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/2013499919047394097/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=2013499919047394097' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/2013499919047394097'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/2013499919047394097'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/06/blog-post_20.html' title='आगामी लेख'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-5852054093595727983</id><published>2009-06-10T19:52:00.002+05:30</published><updated>2009-06-10T19:52:00.329+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तत्वज्ञान'/><title type='text'>श्री गणेश वंदना भाग ४</title><content type='html'>एका हाती भग्नदंत। तेच जाणावे बौद्धमत।&lt;br /&gt;जे वर्तिकांनी खण्डित। स्वभावता॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- भारतीय तत्त्वज्ञान मालिकेत बौध्द तत्त्वज्ञानाला नास्तिक तत्वज्ञान मानल्या जाते. केवळ बौध्द तत्त्वज्ञानाचा विचार केला तर आपल्याला सनातन तत्त्वज्ञानाशी बरेच साम्य दिसते. पण बौध्द तत्त्वज्ञानात कर्म-कांडाला मुळीच स्थान नाही. तसेच शुन्यवाद आणि विज्ञानवादाचा विचार करता सनातन तत्त्वज्ञानापुढे तोकडे पडतात. आद्य शंकराचार्यांनी त्यांच्या भारत भ्रमणात उपस्थित सर्व विचार प्रणालींच्या उपासकांशी वाद-विवाद करून पराजित केले. यातील सर्वात प्रसिध्द म्हणजे मंडन मिश्रा हे मिमांसक होते. त्यांनी आद्य शंकराचार्यांचे शिष्यत्व पत्कारले आणि सुरेश्वर नाव धारण केले. पुढे त्यांच्या ग्रंथ निर्मिती पैकी  बृहदारण्यकोपनिषतवर्तिका, तैत्रेयिकोपनिषतवर्तिका आणि पंचकर्णवर्तिका हे तीन ग्रंथ प्रसिध्द आहेत. या पैकी बृहदारण्यकोपनिषतवर्तिकेत ११,१५१ श्लोक आहेत.  ज्ञानेश्वर महाराजांना बहुतेक या वर्तिकांनी बौध्दांनी प्रस्तुत केलेल्या प्रश्नांचे समाधान केले असे म्हणायचे असेल. मिमांसक विचार प्रणाली कर्म-काडांला प्रचंड महत्त्व देते. पण हि कर्म-कांडे स्वयंभु नसुन त्याच्या मागे वेद-उपनिषदांचे जे तत्त्वज्ञान अभिप्रेत आहे ते आद्य शंकराचार्यांनी सुरेश्वरांना समजावुन दिले. यावरच पुढे सुरेश्वराचार्यांनी हे ग्रंथ लिहिलेत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मग जो सत्कारवाद। तोच पद्मकर वरप्रद।&lt;br /&gt;जो धर्मस्थापक स्वभावसिध्द। तो अभयहस्त॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- गणपतीच्या ज्या हातात कमळ आहे त्या वरदहस्तास ज्ञानेश्वर महाराज सत्कार्यवादाची उपमा दिली आहे. सत्कार्यवादाचे तत्त्वज्ञान कारण आणि कारक या संबंधीची चर्चा आहे. यानुसार परिणाम हे कारणामात्रात आधिपासुनच अभिप्रेत असतात. त्या कारणामात्रा मुळे जे घडत किंवा उदयास येत ते त्या परिणामाचे साक्ष रुप.  सांख्य व अद्वैत या दोन्ही विचार प्रनाली सत्कार्यवाद मान्य करतात. सांख्या अनुसार पुरुष आणि प्रकृती या दोन भागात ज्ञात आणि अज्ञात विश्व विभाजित होते. प्रकृती ही स्वभावता अनादी, अनंत आणि अकार असुन ती पुरुषाच्या अनुभवांद्वारे प्रगट होते.पण सांख्यचा कल द्वैता कडे आहे.  तर अद्वैतानुसार जे परिणाम दिसतात ती सगळी माया आहे. ब्रह्मच सत्य असुन कर्ता आणि कारक केवळ मिथ्या आहे.  या सत्कार्यवादाला महाराजांनी कमळाची उपमा दिली आहेय.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; - गणपतीच्या दुसरा हात जो आशीर्वाद देतो त्यास धर्मस्थापक म्हटले आहे. थोडक्यात, हा वरदहस्त केवळ आशीर्वाद देतो एवढच नाही तर तो संरक्षक आहे. पाठीराखा आहे आणि दुर्बळांना शक्ति देतो हे अभिप्रेत आहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो विवेक अति निर्मळ। तोच शुण्डादण्ड सरळ।&lt;br /&gt;जेथे परमानंद केवळ। महासुखाचा॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- शुण्डादण्ड म्हणजे सोंड. गणेशाची सोंड म्हणजे केवल निर्मळ विवेक असे महाराज का म्हणतात याचा मला मुळीच बोध होत नाही.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-5852054093595727983?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/5852054093595727983/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=5852054093595727983' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/5852054093595727983'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/5852054093595727983'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/06/blog-post_10.html' title='श्री गणेश वंदना भाग ४'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-3157229630155893812</id><published>2009-06-01T06:42:00.001+05:30</published><updated>2009-06-01T06:44:49.925+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तत्वज्ञान'/><title type='text'>यज्ञ-प्रार्थना</title><content type='html'>पूजनीय प्रभो! हमारे भाव उज्वल कीजिये।&lt;br /&gt;छोड देवे छल-कपट को, मानसिक बल दीजिए॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेद की यागे ऋचा, सत्य को धारण करे।&lt;br /&gt;हर्ष मे हो मग्न सारे, शोकसागर से तरे॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अश्वमेधादिक रचा यज्ञ पर-उपकार को।&lt;br /&gt;धर्म-मर्यादा चला कर, लाभ दे संसार को॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नित्य श्रध्दा भक्ति से, यज्ञादी हम करते रहें।&lt;br /&gt;रोग-पीडित विश्व के संताप सब हरते रहें॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भावना मिट जाए मन से पाप अत्याचार की।&lt;br /&gt;कामना पूर्ण होवे यज्ञ से नरनारि की॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाभकारी हो हवन हर जीवधारी के लिए।&lt;br /&gt;वायुजल सर्वत्र हो शुभ गंध को धारण किए॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वार्थ भाव मिटे हमारा प्रेम-पथ विस्तार हो।&lt;br /&gt;'इदं न मम' का सार्थक प्रत्येक मे व्यवहार हो॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेम रस मे मग्न हो कर वंदना हम कर रहे।&lt;br /&gt;नाथ करुणारुप करुणा आपकी सब पा रहे॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;br /&gt;या प्रार्थनेचे रचनाकार कोणास माहिती असेल तर अवश्य कळवावे. &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-3157229630155893812?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/3157229630155893812/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=3157229630155893812' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/3157229630155893812'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/3157229630155893812'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='यज्ञ-प्रार्थना'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-5893030138231701572</id><published>2009-05-17T10:18:00.001+05:30</published><updated>2009-05-17T10:18:00.608+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दीर्घकथा'/><title type='text'>रेखांकित भाग १</title><content type='html'>ऊन विचित्र तापल होत. थंडीतल ते दुपारच ऊन नकोस वाटत होत. रविवारी आणि ते पण या उन्हात कॉलेजच तोंड बघायची मेघनाची मुळीच इच्छा नव्हती पण जसलीन बर्‍याच दिवसांची मागे लागली होती की बाबाच दर्शन घ्यायला म्हणुन ती पाय रेटत डोंगरीच्या पायथ्याशी आली होती. डोंगरीच्या माथ्यावर एक देऊळ होत आणि त्याच्या बाजुला कॉलेज. हा बाबा मात्र डोंगरीच्या पायथ्याशी, कॉलेजच्या मागल्या बाजुला बसत असे. तिथे एक औदुंबराच वृक्ष होत. डोंगरीच्या भोवताली मोहोंजोदाडोच्या अवशेषां सारखे भिंतीचे तुकडे पडलेले होते. बर्‍याच वर्षांपुर्वी डोंगरीच्या भोवताली भिंत बांधण्याचा उद्योग महानगरपालिकेनी केला होता. पण औदुंबराच्या झाडाला हात लावायची कोणातच हिंम्मत नव्हती. झाड तोडल तर तोडणारा निर्वंश होतो म्हणे. खरं काय आणि खोट काय ते औदुंबरच जाणे पण डोंगरीच्या वळखा घालणारी भिंत औदुंबराला वळसा घालुन बांधली होती. बाबा त्या वृक्षा खाली का बसायचा हे मात्र कोणालाच ठाऊक नव्हत. खर सांगायच तर त्या बाबा बद्दलच कोणाला काही ठाऊक नव्हत. त्याला रामटेकच्या बसमधे चढतांना कोणी तरी बघितल होत पण तेवढच. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघना आणि जसलीन त्यांच्या डीओ वरून कुटकुट करत पायथ्याशी पोचलेत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"या बाबा बद्दल तुला कोणी सांगितल?" मेघनानी विचारल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"चार वर्ष झाली कॉलेजची, तुला माहिती नव्हत?"  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" माहिती होत मला पण मी कधी फारसा विचार केला नाही." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुझ बरय, तुला काय!" अस काहीस पुटपुटत जसलीन ने स्टँड लावला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"माझा या भानगडीची थोडी भितिच वाटते" मेघना म्हणाली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"भिती काय वाटायची त्यात आणि भानगड का म्हणतेस?  तु कधी  कुंडली किंवा हात दाखवला आहेस का?" जसलीनने विचारल. मेघना काहीच बोलली नाही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मग एकदा दाखव आणि बघ काय होत ते" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्या दोघी बाबाच्या दिशेनी चालु लागल्यात. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"भविष्या जाणुन करायच काय? बदलता थोडीच येत ते. जे व्हायच तेच होणार. आगोदर माहिती करून घ्यायची आणि मग जिवाला घोर लावुन घ्यायचा. "  मेघना म्हणाली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आणि तसही सध्या सगळ व्यवस्थित चालु आहे. विचारयला काहीच नाही. पण बाबानी सांगितलेलं सगळ खरं ठरत का? " &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जसलीनच मेघनाच्या बोलण्याकडे लक्ष नव्हत. ती बाबा आपल्याला काय सांगणार याचा विचार करत असावी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जसलीनच लग्न तिच्या घरचे गावातल्याच एका मुलाशी ठरावयला बघत होते. जसलीनला तो पोरगा मात्र मुळीच पसंद पडत नव्हत. तिच अजुन कोणावर प्रेम वगैरे नव्हत पण हा मुलगा तिला काहीतरी खोटा वाटत होता. तिची रहाणीमान साधी होती. पंजाबी असुन मराठी मैत्रिणींमधे राहुन ती मराठी जास्त वाढली होती तर हा पोरगा लहाण पासुन घरचा धंदा बघत असे आणि मस्तवाल हिंडत असे. त्याला एकदाच ती भेटली होती पण त्या एकाच भेटीत तिनी धास्ती खाल्ली.  तिला पुढे शिकायच होत. लग्न झाल्यावर उच्च शिक्षण घेण अशक्य होत. घरचे आपल ऐकणार की नाही, लग्न याच मुलाशी कराव लागणार कि काय आणि करावच लागल तर पुढे काय या प्रश्नांशी ती झगडत होती. बाबा काहीतरी जादु करेल अशी काहीशी तिनी भाबडी समजुत करून घेतली होती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा औदुंबराच्या झाडाखाली सतरंजी घालुन बसला होता. त्याची वेशभूषा अनपेक्षित होती. वापरलेला पण स्वच्छ झब्बा-पायजमा, चष्मा लावलेला, त्याच्या कपाळावर धगधगीत लाल रंगाच गंध होत. बाबा म्हटल कि ज्या ठराविक गोष्टी डोक्यात येतात त्याच्या विपरीत हा बाबा होता. याला यशवंतराव हाक मारली असती तरी चालल असत. मेघना आणि जसलीन बाबापासुन काही अंतरावर उभ्या होत्या. बाबा कोणाशी तरी बोलण आवरत घेत होता. एक तरूण मुलगी घळाघळा अश्रु गाळत होती आणि तिच्या सोबत तिचे आई-वडिल असावेत, ते स्तब्ध होउन बाबाच बोलण ऐकत होते.  ते बघुन या दोघी थोड्या चरकल्या. प्रकरण गंभीर दिसत होत पण बाबा शांत चेहर्‍यानी बोलत होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधीचे आलेले लोक जायला लागलेत. मेघना त्या लोकांकडे वळुन वळुन त्या लोकांकडे बघत होती. इतकी कुठली वाईट परिस्थिती त्यांच्यावर गुदरली होती हे तिला माहिती करून घ्यायच होत. जसलीन च लक्ष मात्र आता बाबावर होत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आओ बेटी।" बाबा जसलीन ला बघुन बोलला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नमस्ते बाबाजी।" म्हणत जसलीन बाबाचे पाय शिवायला पुढे झाली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे बेटी मेरे पैर छुं क्या मिलना है? पैर तो उसके छुंओ जो पर्वत के माथे पे बैठा है।" बाबा हसत म्हणाला. तरी जसलीन ने नमस्कार केलाच. मेघना थोडी अवघडुनच उभी होती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा सूर्य प्रकाशा कडे पाठ करुन बसला होता. त्यामुळे समोर बसलेल्याच्या चेहर्‍यावर स्वच्छ प्रकाश पडत असे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेरे पास मेरी जनम-कुंडली नही है।" जसलीन म्हणाली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कुंडली की कोई आवश्यकता नही है बेटी. तेरे माथे पर सब कुछ लिखा हुआ है।" अस म्हणत बाबाने जसलीनच्या कपाळावर नजर रोखली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जसलीन काही बोलणार तर हातानी इशार करून बाबानी तिल थांबवले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब पुछो जो पुछना है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेरी शादी तय हो रही....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"उसिसे तुम्हारी शादी होनी है।" बाबा निर्विकारपणे मधेच तिच वाक्य तोडुन म्हणाला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जसलीन स्तब्ध झाली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पर मुझे और पढना है। और मुझे वो लडका पसंद भी नही है"। ती कसतरी बोलली. तिचा गळा भरून आला होता. पूर्ण गोष्ट न ऐकता बाबा एकदम फटक्यात निकाल लावेल अस तिला वाटल नाही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बाबाजी, आप कुछ तो कर सकते हो?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"देखो बेटी, मैं कोई जादुगर नही हुं। जो लिखा है वो भगवान कि कृपा से मैं पढ सकता हुं। जो होना है वही होना है और जो ना होना है वो कभी ना होना है। पर तुम्हारे भाग मे अच्छा ही लिखा है। जैसा तुम समजती हो वैसा वो नादान नही है। हां पर शुरुवात मे परेशानी दोनो को होनी है। उसके पश्चात भगवान कि कृपा तुम दोनो पर होगी।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अजुन काय बोलाव ते जसलीनला सुचेना. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बेटी, तुम्हारे नसिब मे आगे पढना लिखा है।" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोणी अजुन काहीच बोलेना. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुम्हे इतना सोचने की या चिंता करने की कोई आवश्यकता नही है।" बाबा पुढे म्हणाला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब बेटी तुम सामने युं बैठो।" बाबा मेघना कडे बघुन म्हणाला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मला काही विचारयचा नाही या" मेघना पटकन म्हणाली. आपण मराठीत बोललो हे तिला लगेच कळल पण मग काहीतरी विचार करून ती बाबा समोर जाऊन बसली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबाच्या कपाळावर आठ्या जमल्या. त्याने मोठ्ठा निश्वास टाकला. त्याचे डोळे गंभीर झालेत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पुछो अब क्या पुछना है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मुझे नही पता मुझे क्या पुछना है।" मेघनाला हे म्हणतांना आपण खुपच बावळटा सारख बोलतोय अस वाटत होत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बेटी, बिना पुछे मैं कुछ बता नहीं सकता।" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघना काहीच बोलली नाही पण तिच्या डोक्यात विचार आला की पुढे काय घडणार हे विचारण्या ऐवजी मागे काय घडल हे विचाराव. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बाबाजी, आप मुझे मेरा भूतकाल बता सकते हो" तिला वाटल की बघु तरी बाबात किती दम आहे ते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बेटी, भूतकाल बता कर क्या होना है। जो बित चूक है वो तो तुम्हे पता हि है। जिस प्रश्न का उत्तर पता हो, उसे प्रश्न नही कह्ते।" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघना परत विचार करु लागली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेरी शादी कब होगी?" काहीतरी विचाराव म्हणुन तिने विचारल.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"इसी साल तुम्हारी शादी होनी है।" बाबा फारच गंभीर झाला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघना चांगलीच चमकली. कॉलेज संपल्यावर ती अमेरिकेत उच्च शिक्षणासाठी जाण्याची तयारी करत होती. अनिकेत सोबत. तिथे मास्टर्स संपल्यावर अनिकेतशी लग्न. पण अजुन दोन-तीन वर्ष तरी दोघांचा लग्नाचा विचार नव्हता. तिच्या डोक्यात विचारांची झुम्मड उडाली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"और पुछो बेटी" बाबाला अजुन काहीतरी महत्त्वाच सांगायच होत पण विचारल्या शिवाय काही न सांगण्याचा त्याचा नियम दिसत होता. मेघना काहीच बोलत नव्हती म्हणुन तो सारखा तिला डिवचत होती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बेटी, कुछ बाते ऐसी होती है जो जानने पर जिना कठीन कर देती है। इसका अर्थ ये नही की वो बाते पता न हो तो बेहेतर है। क्योंकी सत्य कालकूट विष समान होता है। न जानो तो मुश्कील और जानो तो भी मुश्कील।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा हे अगम्य काय बोलत होत हे तिला कळेना.  ती आता चांगलीच घाबरली होती. तिच्या मनात प्रश्नांच काहुर उठला होता. बाबा ज्या शांतपणे आणि आत्मविश्वासाने बोलत होता ते बघुन तो खोटं बोलतोय अस तर वाटत नव्हत. त्यातुन त्याची ख्याती तिला आधिपासुन माहिती होती. तो भविष्य सांगण्याचे पैसेही घेत नसे किंवा हे करा-ते करा असल काहीसुध्दा सांगत नसे. पण बाबाच्या बोलण्याचा संदर्भच लागत नव्हता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"इसलिये उस विष को मन के भितर समा कर, आत्मसात करना यही एक उपाय है। होनी को कोई टाल नही सकता। स्वयं भगवान भी कुछ नही कर सकते। इसलिये जो होना है उसे स्विकार करे आगे बढो।" बाबा बोलतच होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेरी शादी अनिकेतसे ही होनी है ना?" मेघना नी चाचरत विचारल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनिकेत कोण हे बाबाला अर्थातच माहिती नव्हता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बेटी, ध्यान से सुनो। तुम जिसकी परिणीता होगी उसकी मृत्यु होनी है।" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघना थंड पडली. आपण कुठल्या भानगडीत पडलो अस तिला झाल. ती डोळे मोठ्ठे करून बाबा कडे बघत होती. खुप जोरात तिथुन पळुन जावस वाटत होत. पण बाबा पुढे काय बोलणार, काय सांगणार हे तिला ऐकायच होत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काही तर करू शकतो? यावर काहीच उपाय नाही हे कस शक्य आहे? तुम्ही खर बोलताय हे कशावरून?" मेघना कावुन बोलत होती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मैं सच बोल रहा हुं या झुठ ये तो समय हि बताएगा। वैसे भी मुझे झुठ बोल के क्या मिलना है।" बाबाने शांतपणे उत्त्तर दिलं मग तो पुढे म्हणाला " जो होना है उसे होने दो। उससे खिलवाड मत करो।"  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काही क्षण असेच गेलेत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुम्हारा घर-संसार बसेगा और तुम बहोत सुखी होगी। पर उसके लिए तुम्हे इस कालकूट विष को मन मे धरे रखना होगा।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मागे कोणीतरी अजुन येउन उभ होत. आणि तसही बोलायला आणि ऐकायला काहीच उरल नव्हत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेघनाची नजर शुन्यात होती. काय झाल हे तिला अजुन झेपल नव्हत. जसलीन ला काय बोलाव सुचत नव्हत. तिनी मेघनाचा हात हात घट्ट धरला आणि त्या दोघी गाडी कडे चालू लागल्यात. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(क्रमशः)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-5893030138231701572?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/5893030138231701572/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=5893030138231701572' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/5893030138231701572'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/5893030138231701572'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/05/blog-post_17.html' title='रेखांकित भाग १'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-8384071341301992481</id><published>2009-05-02T10:31:00.001+05:30</published><updated>2009-05-02T10:31:01.599+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिव-महिमा'/><title type='text'>शिव-राज्यारोहण भाग २</title><content type='html'>छत्रपतींच्या राज्याभिषेकाला भारतीय ईतिहासात अनन्यसाधारण महत्त्व का आहे याचा संक्षिप्तात आढावा आपण मागच्या लेखात घेतला. या लेखात त्यांच्या राज्याभिषेकाला सध्य काळात फारस महत्त्व का दिल्या जात नाही याबद्दल चर्चा करणार होतो.  पण त्या आधी मला राज्याभिषेकाचे महत्त्व सिध्द करणारे अजुन काही मुद्दे सुचले. ते मी इथे प्रथम प्रस्तुत करतो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मागल्या लेखात शिव-राज्यारोहणाच्या वेळीस भारतीय उपखंडात मुसलमानी सत्तांची स्थितीची चर्चा मागल्या लेखात केली पण या मुसलमानी सत्तां व्यतिरिक्त पोर्तुगित, इंग्रज आणि फ्रेंच या तीन युरोपियन सत्ता भारतात जम बसविण्याचा प्रयत्न करत होत्या. त्यातील ब्रिटिश पुढे राज्यकर्ते झालेच. पण शिवा-जी राजांच्या वेळी सगळ्यात अधिक धोका पोर्तुगिज लोकांकडुन होता. १४व्या शतकाच्या अंतिम भागात नविन जग पादाक्रांत करण्यास युरोपियन देशांनी आरंभ केला. यात स्पॅनिश आणि पोर्तुगिज लोक आघाडीवर होते.  अर्थात, जग पादाक्रांत करायला ही लोक निघाली नाहीत. भारताला जाण्याचा समुद्री मार्ग शोधण्याच्या प्रयत्नात त्यांना ती संधी मिळाली आणि त्या संधीचा या युरोपिय देशांनी पुरेपुरे फायदा उठवला. मुसलमानी अंमल अरबी आणि पर्शिया प्रांतावर स्थापित झाल्यापासुन भारताशी आणि चीनशी व्यापार करण्याचे सर्व मार्ग मुसलमानी प्रांतातुन जात असत. मुसलमान आणि ख्रिश्चनांमधील धार्मिक युध्दांना १४ व्या शतकात ऊत आला होत त्यामुळे भारतात जाण्यासाठी समुद्री मार्ग शोधणे आवश्यक झाले होते.  भारत शोधण्याच्या मार्गातच दोन्ही अमेरिका खंडांचा शोध लागला. साम्राज्यवादाचा पायंडा इथे पडला. पृथ्वी गोल आहे या वर विश्वास ठेउन कोलंबस पश्चिमेला निघाला. पश्चिमेला जात गेलो तरआपण जगाच्या पूर्वेला पोचु आणि त्या अन्वये भारताच्या पूर्व किनार्‍याला पोचु असे त्याला वाटले. पण तो मधे अमेरिका खंड लागलेत. पण तो वेगळा ईतिहास आहे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; त्या काळात वास्को-द-गामा अफ्रिका खंडाला वळसा घालुन सन १४९८ ला कालिकतला पोचला. तेथुन तो पुढे गोव्याला पोचला. तेंव्हा पासुन पोर्गुगिज लोकांच प्रस्थ वाढत गेल आणि सन १५४३ लात्यांनी गोव्यात सत्ता  प्रस्थापित केली. याच दरम्यान पोर्तुगिजांनी दक्षिण अमेरिकेतही सत्ता प्रस्थापित केली. या भागाला आपण आज ब्राझिल म्हणुन ओळखतो.  त्यांच्या स्पर्धेत स्पॅनिशही होते. त्यांनी मध्य व दक्षिण अमेरिकेत हैदोस मांडला आणि संपूर्ण खंडच गिळंकृत केला.  या दोन्ही सत्त क्रूर पणात मुसलमानी सत्तांच्या एक पाऊल पुढेच होत्या. यातील स्पॅनिश भारताच्या दिशेनी कधीच आले नाहीत. पण शिवशाहीच्या उदयाच्या वेळेस पोर्तुगिज मात्र भारतावर राज्य करण्याची स्वप्न रंगवित होते. माझ्या मते त्यांच्या मनसुब्यांना खरा सुरंग मराठ्यांनीच लावला. हे खर की मराठ्यांना गोवा कधीच जिंकता आल नाही. (पेशव्यांच्या काळात  मराठ्यांनी  गोवा जिंकलच होत. त्या चढाईच्या शेवटी पोर्तुगिज सत्ताधिशांनी पळुन जाण्यासाठी अक्षरशः बोटी तयार ठेवल्या होत्या. पण काही तरी भानगड झाली आणि हाता-तोंडाचा घास गेला.) पण मराठ्यांमुळे पोर्तुगिजांना गोव्याबाहेर पाऊलच ठेवता आल नाही. जंजिरा,  मराठा आणि सिद्दी यांच्यामधे अक्षरशः तळ्यात-मळ्यात करत होता. पण हे सिद्दी पोर्तुगिजांपेक्षा वेगळे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रिटिश हे साम्राज्यवादाच्या आणि भारत शोधण्याच्या खेळात खुप उशीरा उतरलेत. त्यांनी हात पाय पसरायला सुरुवात केली तेंव्हा पोर्तुगिज आणि स्पॅनिश सत्तांनी जग अक्षरशः आपापसात वाटुन घेतल होत. पोपने पूर्व भाग पोर्तुगिजांना तर जगाचा पश्चिम भाग स्पॅनिश लोकांना दिला होता. त्यामुळे प्रस्थापित परिस्थितीत लुडबुड करून आपली जागा करण्यात इंग्रजांना बरीच वर्ष लागलीत. पण १६व्या शतकात त्यांने उत्तर अमेरिकेत पाय रोवले होते. या भागाला आपण कॅनडा आणि संयुक्त राज्य अमेरिका म्हणतो. तसच वेस्ट इंडिज या बेटेही इंग्रजांनी लौकरच स्पॅनिशांकडुन जिंकली. बोस्टन (या भागाला अजुनही न्यु इंग्लंड असेच संबोधिल्या जात.) भागात तर इंग्रजी लोकांनी महाविद्यालये ही स्थापन केली होती. जगप्रसिध्द हार्वड महाविद्यालयाची स्थापना सन १६३६ची आहे. तेंव्हा शिवाजी राजे सहा वर्षाचे होते!   राजांनी भारताच्या राजकीय पटलावर पदार्पणाच करणाच्या  वेळी इंग्रजांच्या सुरत आणि मुंबई येथे वखारी कार्यरत होत्या. त्या काळात मुघली सत्ता इतकी शक्तिशाली होती की त्यांच्याशी टक्कर देण्याची हिंम्मत कोणातच नव्हती. त्यामुळे सुरतेतले आणि मुंबईतील इंग्रज फक्त व्यापारा निमित्ताने तिथे बसले होते अस मानणे सुद्धा चुकीचे ठरेल. कारण  व्यापारा अतिरिक्त त्यांनी इतर जे उद्योग मांडले होते त्याकडे बघता आज ना उद्या मोघलांची शक्ति कमी होईल आणि तेंव्हा आपण आपली सत्ता प्रस्थापित करू अशी इंग्रजांची धारणा अरण्याची शक्यता आहे. उत्तर अमेरिकेत ही लोक तेच करत होते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मधे मला सन १६३० चा डच लोकांनी तयार केलेला जगाचा नकाशा मिळाला. त्यात भारतीय उपखंड सोडला तर उर्वरीत जगात युरोपिय सत्ता झपाट्याने पाय पसरित होत्या. त्यामुळे लौकरच या सत्ता भारतावर नजर रोखणार होत्या हे सांगायला ब्रह्मदेवाची आवश्यकता नाही. भारताबाहेर बलाढ्य असल्यात तरी भारतात सत्ता प्रस्थापित करण्यासाठी कुठल्याही युरोपिय सत्तेकडे पुरेसे मनुष्यबळ किंवा आवश्यक माहिती नव्हती. माझ्याकडे असलेल्या या नकाशात भारताच्या भागात बर्‍याच चुका दिसतात. थोडक्यात युरोपिय सत्तांना भारतीय भूगोलाचीही पुरेशी माहिती नव्हती. पण त्यांच्याकडे अनोळखी भूभागवर जाऊन अपरिचित जनसमुदायावर राज्य करण्याचा चांगलाच अनुभव होता. यासाठी अमेरिका खंडाचा रक्ताने माखलेला ईतिहास सगळ्यांनी अवश्य वाचायला हवा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजांना जगाच्या दुसर्‍या टोकाला युरोपिय सत्तांनी थैमानाची कल्पना असण्याची शक्यता फारच कमी आहे. पण त वरून ताक-भात. त्याप्रमाणे ते गोव्याच्या पोर्तुगिजांच्या मागे हात धुवुन लागले होते. या समुद्री चाच्यांना कायमच नेस्तनाभूत करण्यासाठी त्यांनी अविश्रांत परिश्रम घेतलेत. चोला राजां नंतर नौदल स्थापन करणारे ते पहिलेच दूरदृष्टे होते. ही या युरोपिय लोक समुद्रावर राज्य करतात हे त्यांनी हेरले होते. समुद्री विज्ञानात आणि जहाज बांधणी तंत्रज्ञानात युरोपिय सत्ता फार अधिक प्रगत होत्या. जादुनाथ सरकार यांच्या नुसार युरोपिय जहाजांपुढे मराठ्यांच्या अक्षरशा नाव्हाड्या होत्या. पण राजांनी एक मुत्सद्दी चाल खेळली. एका हातानी त्यांनी युरोपिय लोकांकडुन तंत्रज्ञान शिकुन घेण्याची खटपट चालु केली  (महाराजांची इंग्रजी व्यापार्‍यांशी चाललेली बोलणी अवश्य वाचावी) तसच कमी तंत्रज्ञानाच्या असल्या तरी संख्येनी  अधिक होड्या आणि जहाजे बांधण्याचा राजांनी सपाटा लावला. राजांना हे माहिती होते कि युरोपिय लोकांनी कितीही मोठी जहाजे बांधलीत तरी त्यांना समुद्रपट्टीवर तर लागावेच लागेल. त्यामुळे समुद्रपट्टीच जर का सशक्त केली तर ही युरोपिय लोकांशी टक्कर देणे शक्य आहे हे त्यांनी अचूक ताडले.त्यामुळे त्यांनी कोकण किनारपट्टीवर किल्ले बांधायला सुरुवात केली. सिंधुदुर्ग किल्ला म्हणजे राजांचा मुकुटमणी होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन १६व्या व १७व्या शतकाच्या पूर्वाधात शतकात भारतीय उपखंडात तसेच नव्याने शोध लागलेल्या जगाच्या काना-कोपर्‍यात काय चालले हे ध्यानात घेता महाराजांच्या स्वराज्य स्थापनेला एक वेगळे तेज प्राप्त होते.   १७ व्या शतकात हिंदु समाज या नविन आक्रमकांच्या तुलनेत अशक्त होता. अत्यंत वेगाने बदलत चाललेल्या राजकीय परिस्थितीत स्वतःचे स्थान स्थापन करणे तर अशक्यप्राय होते. तसेच मुसलमानी आणि ख्रिश्चन धर्मांधांनी जो भारतीय उपखंडावर पिंगा घातला होता त्याचा सामना करण्यासही असमर्थ होता. या सर्व मुद्द्यांचा विचार केल्यावर महाराजांच्या मुत्सद्दीपणा आणि शौर्य अधिक झळाळु लागत. राजांनी स्वराज्याची स्थापना केली आणि राज्याभिषेक केला त्यामुळे युरोपिय सत्तांचे पसरणे खुंटले. पोर्तुगिज तर गोव्यातच जणु बंदिस्त झालेत आणि राजां नंतर जवळपास दिडशे वर्षां नंतर ब्रिटिश सत्ता जी प्रस्थापित झाली ती बंगाल प्रांतात, महाराष्ट्रातुन नव्हे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या सगळ्या प्रसंग बांधणीत कुठल्या राजकीय मुद्द्यामुळे राजांच्या छ्त्रचामर अभिषेकाला कमी लेखल्या जाते याची चर्चा राहुन गेली. त्यासाठी मुख्यत्वे १९ व्या शतकातील आणि थोड्याफार प्रमाणात स्वातंत्र्योत्तर काळातील राजकीय परिस्थिती वर विचार करायला हवा. तो आपण पुढील लेखात करू या.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-8384071341301992481?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/8384071341301992481/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=8384071341301992481' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/8384071341301992481'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/8384071341301992481'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='शिव-राज्यारोहण भाग २'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-2261534936544585104</id><published>2009-04-25T10:57:00.000+05:30</published><updated>2009-04-25T10:06:44.239+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तत्वज्ञान'/><title type='text'>कृष्ण गोविंद गोपाल गाते चले।</title><content type='html'>कृष्ण गोविंद गोपाल गाते चले।&lt;br /&gt;मनको, विषयोंके विषसे हटाते चले॥धृ॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंद्रियों के न घोडे, विषय से अडे।&lt;br /&gt;जो अडे भी तो, संयम के कोडे पडे।&lt;br /&gt;मन के रथ को, सुपथ पर बढाते चले ॥१॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाम  जपते रहे,  काम करते रहे।&lt;br /&gt;पाप की  वासनाओं से, डरते रहे।&lt;br /&gt;सद् गुणोंका परमधन कमाते चले॥२॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग कहते है, भगवान आते नहीं।&lt;br /&gt;रुक्मिणी की तरह, हम बुलाते नहीं।&lt;br /&gt;द्रौपदी की तरह, धुन जपाते चलो॥३॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग कहते है, भगवान खाते नही।&lt;br /&gt;भिल्लिणी की तरह हम खिलाते नहीं।&lt;br /&gt;साक प्रेमी विदुर रस निभाते चले ॥४॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दु:ख मे तडपे नही, सुख मे फुले नही।&lt;br /&gt;प्राण जाये मगर, धर्म भुले नही।&lt;br /&gt;धर्मधन का खजाना, लुटाते चलो॥५॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वक्त आयेगा ऐसा, कभी ना कभी।&lt;br /&gt;हम भी पायेंगे, प्रभुको कभी ना कभी।&lt;br /&gt;ऐसा विश्वास मनमे जमाते चलो॥६॥ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;या कवितेचे रचनाकार कोण आहे, हे मला माहिती नाही. कोणाला रचनाकाराची कल्पना असेल तर अवश्य कळवावे.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-2261534936544585104?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/2261534936544585104/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=2261534936544585104' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/2261534936544585104'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/2261534936544585104'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/04/blog-post_25.html' title='कृष्ण गोविंद गोपाल गाते चले।'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total 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href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=5814032255330325415' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/5814032255330325415'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/5814032255330325415'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/04/blog-post_20.html' title='आगामी लेख'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-3212726677795269699</id><published>2009-04-13T10:09:00.002+05:30</published><updated>2009-04-13T17:50:39.001+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यक्तीचित्रे'/><title type='text'>चांदोरकर सर- भाग २</title><content type='html'>सरांचे लेंढ्रा पार्काजवळ मोठ्ठ घर होत. त्यांनी नुकतच ते बिल्डर ला विकुन फ्लॅटस बांधुन घेतले होते. त्या इमारतीतच त्यांचा मोठ्ठा फ्लॅट होता. त्यांच्या कडे येणार्‍या प्रत्येक विद्यार्थ्यांना ते शिकवणी वर्गात प्रवेश देत असत. त्यामुळे बंड मुले बरीच येत असत.आता बंडपणा सगळीच मुलं करतात (काही शंख अभ्यासु मुळे वगळता!) पण मस्ती करण्यातही बरेच रंग असतात. आणि त्यातला सगळ्यात शेवटचा गडद काळा रंग म्हणजे वाया जाण्याची मुख्य चिन्हे असत. असली नालायक मुलेही त्यांच्या वर्गात असत. त्यामुळे शांतपणे वर्ग चालला आहे आणि सरांनी शिकविलेलं सगळ्यांना समजतय अस नेहमीच होत नसे. एकतर सर स्वतःच सतत विनोद करायचे. त्यामुळे मुले ही सारखी मस्ती करायची. बहुधा म्हणुनच "हुशार" मुलांनी सरांच्या शिकवणी लावणे बंद केले. आणि मेरिट येण्यार्‍या लोकांची संख्या कमी झाल्यावर सरांना शिकविता येत नाही अशी समजुन नविन पालकांनी करुन घेतली. सरांना हे कळत नव्हत अस नाही पण यावर उपाय काय हे सुचत नसाव. त्यांची खिन्नता मधुन मधुन डोकावत असे. जुन्या नावाजलेल्या विद्यार्थ्यांचा ते सारखा उल्लेख करत असत पण कधी कधी मुलांच्या मस्तीनी ते कावुन जात असत. मग ते खालच्या आवाजात समोर बसलेल्या विद्यार्थ्यांना सांगत की 'श्रीकृष्ण मराठे कधीच अशी मस्ती करत नसे. नेहमी प्रश्न विचारित असे. हुशार होता पण अभ्यासही खुप केला त्याने. म्हणुनच इतक्या वरचा मेरिट आला'. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण मराठे आमच्या शाळेतुन बहुधा पहिल्या दहा मधे मेरिट होता. शाळेच्या वाचनालयात त्याच नाव लावल होत. तो माझ्याहुन ३-४ वर्ष मोठा असावा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमच्या वर्षी सरांच्या शिकवणितुन कोणी मेरीट आल नाही. 'पहिला मेरिट' तर मेरिट लिस्ट च्या आस-पास हि भटकला नाही. मला गणितात अपेक्षेप्रमाणे टक्केवारी मिळाली. मला डि ग्रुप ची गणित सोडविता आली याचा मला खुप आनंद झाला. गणिता बद्दलची भिति सरांनी काढुन टाकली. (१२ वीच्या शिकवण्यांनी ती भीती परत मनात कायमची बसली!) सरांच्या पुढल्या वर्षीच्या शिकवण्या व्यवस्थित सुरु होत्या. तेच विनोद पण हशे मात्र नविन पिकत होते. मी अधेमधे सरांकडे डोकावत असे. दसर्‍याला हमखास मी सोनं द्यायला जात असे. खुपदा संध्याकाळी सर फाटकात उभे असायचे. सरांच्या हातात कला छान होती. पेंटिंग तसंच कागदाच्या किंवा लाकडाच्या कलाकृती ते फार छान करत असत. दिवाळीच्या सुट्ट्यांमधे ते क्लासच्या जागेत छोटस प्रदर्शन लावित असे. त्यांना त्यांच्या कलाकृतींचा फार अभिमान होता. शिकविण्याच्या तापातुन निघण्याचा तो त्यांचा मार्ग असेल. मला आणि पराग ला नेहमी ते म्हणत असत कि "एवढे गोरे-गोमटे आहात थोड्या कलाकृती विकुन द्या" मग आम्ही म्हणायचो की "सर, कमिशन किती देणार?".  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम्हीही वाह्यातच पोरं होतो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरांची तब्येत तेवढी धड-धाकट नव्हती. आमच्या वर्षी आम्हाला त्यांच्या तब्येती मुळे एक-दोन आठवडे सुट्टी मिळाली होती. ते बरेचदा 'आज मुळीचबरं वाटत नाही या' अस म्हणत असत. त्यांच्या इतर विनोदांपैकी हा पण एक विनोद होता की ते खरच म्हणत असत हे कळायला मार्ग नव्हता. तेंव्हा सरांच्या गणितोत्तर प्रत्येक वाक्याला आम्ही हसत असु. मी दहावी झाल्या नंतर दोन वर्षाच्या आत सर वारलेत. मला उशीरा कळल. रामदास पेठेच्या टवाळखोर मित्रांशी भेटी कमी होत असत आणि तरूण भारताने नेहमीच्या नियमाने निधनाची बातमी छापायला दोन दिवस घेतलेत. अंत्ययात्रेला जाता आल नाही याच मला फार वाईट वाटल. मनात उगाचच अपराधी भाव येत होता. सरांना तुम्ही खुप छान शिकविता अस एकदा तरी म्हणायच होत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मी आणि पराग नंतर त्यांच्या घरी दिव्याला नमस्कार करायला गेलो होतो. घराच्या फाटकात "का, रे, पार्कात कोणा-कोणासोबत दिसतोस तू! चांगल्या पार्कात घेउन जाव "कोणा-कोणाला" लेंढ्रा पार्कात काय?" अस म्हणायला सर नव्हते. सर नसल्याची जाणीव पहिल्यांदा तिथे झाली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहेरच्या खोलीत दिवा तेवत होता. त्यांच्या पत्नी बसल्या होत्या. "सर, नेहमी साठी गेलेत" अस त्या कसतरी म्हणाल्यात. त्यांना हुंदका आवरत नव्हता. आमच्याकडेही फारस बोलायला काय असणार. नमस्कार करून आम्ही परतलो. आमचा जेमतेम सहवास एक वर्ष तरी आम्हाला एवढ वाईट वाटत होत. सरांच्या कुटुंबियांवर काय बितत होती ते न कळलेलच बर. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर नेहमी वर्गात म्हणत कि मला शिकवितांच मरण याव. गणिताचा थिओरम शिकवुन, कोरोलरी शिकवायच्या आत इथेच खडुने माखलेल्या फरशीवर धाडकन कोसळुन जाव. मरतांना गंगेच्या पाण्या ऐवजी तोंडात थोडा खडुचा चुरा टाका अस ते म्हणत असत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"का रे पहिला मेरीट करशील एवढ माझ्या साठी?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हो सर" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कसला नालायक आहे हा पोरगा. माझ्या मरायची वाट बघतोय. फी आण उरलेली आधी. माझ्या तोंडात खडु टाकायला एका पायावर तयार आहे" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्गात परत हशा पिकत असे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तसल काही झाल नाही आणि सर सर्व मान्य मार्गाने हॉस्पिटल मधे गेलेत. पण त्या आठवणींनी अजुनही हसु येत. आणि सरांनी शिकविण्यावर किती निरातिशय प्रेम केल हे बघुन नवल वाटत. आजकालच्या निव्वळ पैश्यासाठी शिकविणार्‍यांच्या गर्दीत शिकविण्याच्या प्रेमापोटी शिकविणार्‍या पैकी ते बहुधा शेवटलेच होते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(समाप्त)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-3212726677795269699?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/3212726677795269699/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=3212726677795269699' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/3212726677795269699'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/3212726677795269699'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/04/blog-post_13.html' title='चांदोरकर सर- भाग २'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-7968163100675365620</id><published>2009-04-08T08:55:00.002+05:30</published><updated>2009-04-08T08:55:00.523+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यक्तीचित्रे'/><title type='text'>चांदोरकर सर - भाग १</title><content type='html'>"आमचं आण्णाव चांदोरकर आहे. आम्ही दोरानी सगळ्यांना बांधतो. एका-मेकांना जवळ करतो. चांदूरकर वेगळे. ते सगळ्यांना दूर करतात. गल्लीच्या टोकाशी जे वकील रहातात ते चांदूरकर. आम्ही चांदोरकर." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आण्णावा बद्दलचं हे विश्लेषण विद्यार्थी पहिल्यांदा ऐकत नव्हते. पण सर ज्या उर्मीने आणि उत्साहाने सांगत ते ऐकुन प्रत्येक वेळेस हसु येत असे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे, काय रे पहिला मेरिट?" मागल्या बाकावरच्या विद्यार्थ्याकडे बघुन ते ओरडले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"लक्ष आहे का मी काय बोलतोय ते? काय आण्णाव आहे माझ?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"चांदूरकर" मागुन उत्तर आल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नालायक आहे तो. पहिला मेरिट यायच्या आधीच फुशारकी मारतोय लेकाचा." सर जवळच्या विद्यार्थ्यांना म्हणालेत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" हो बरोबर आहेय तूझ. तू दूर आहेस ना माझ्यापासुन म्हणुन माझं आण्णाव चांदूरकरच वाटेल तुला. जवळ तर ये, मग टांगतो तूला उल्टा दोरानी आणि देतो डी ग्रुपच्या प्रश्नांची धूरी!" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्गात हशा पिकला. पहिला मेरिटही हसत होता. दहावी गणिताच्या पेपरमधे शेवटचे २० गुण डी ग्रुप म्हणुन प्रसिध्द होते. पुस्तका बाहेरचे हे प्रश्न फार कठिण मानल्या जात असत. फाटका समोर देशमुख उगाच घुटमळत होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ऐ, काय रे? मागल्या वर्षी क्लासमधे होता तेंव्हा तर नाहि आलास कधी. नालायक!" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सगळी मुलं मागे वळुन बघु लागली. देशमुख वर्गातील मुलांना हात-वारे करत पळुन गेला. सगळी विद्यार्थी परत हसु लागली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चांदोरकर १०वी वर्गाचे गणित शिकवित असत. त्या काळात दहावी बोर्डाच्या परीक्षांना अवास्तव महत्त्व प्राप्त झाले होतो. या परीक्षेत चांगले टक्केवारी मिळाली कि बारावी साठी चांगल्या कॉलेजमधे प्रवेश मिळणार. मग परत शिकवण्या लावायच्यात. मग १२वीच चांगली टक्केवारी मिळाली कि सगळे इंजिनिअर आणि डॉक्टर बनायला तयार. जणु काही पूर्ण आयुष्यच दहावीच्या परीक्षेवर अवलंबुन होत. दहावीच्या वर्गाचा अभ्यास ९ वीच्या परिक्षे आधीच सुरु होत असे. शहरातील एक 'ते' सुप्रसिद्ध शिक्षकानी पालक आणि विद्यार्थ्यांच्या आततायीपणावर चांगला धंदा उघडला होता. ८वीच्या सहा-माही परिक्षेच्या गुणांवर ते सर ९वीच्या शिकवणीत प्रवेश द्यायचे. त्यांची फी रग्गड होती. पण तीथे प्रवेश मिळाला की विद्यार्थ्याला हुशार असल्याचा शिक्का लागायचा. पण गंम्मत एवढ्यावर संपत नव्हती. त्या सरांची ९ वीची परीक्षा शालेय परीक्षेपेक्षा वेगळी होत असे. त्यात कमी गुण मिळालेत तर त्यांच्या १०वीच्या क्लासेस मधे प्रवेश मिळत नसे. अर्थात, १०वीच्या क्लासेस ची फी रग्गड गुणा दोन! त्यांनी स्वतःची शाळाच का उघडली नाही माहिती नाहि. पण बहुधा वाट्टेल तसा पैसा छापता नसता आला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माझा ८वीच्या परीक्षेमधे बाजा वाजला होता. ९वीत मी अभ्यास करणं सोडुन दिलं होत. पण तरी १०वीच्या उन्हाळ्यात त्या 'सुप्रसिध्द' शिक्षकाच्या समर क्लासेस मधे माझ्या पालकांनी जबरदस्ती घातल होत. तीन महिन्यात मी मुळीच हुशार झालो नाही. (ते सर स्वतः शिकवत नव्हते. त्यांचा 'स्टाफ' आम्हाल शिकवित असे.) पण मला मनापासुन या सगळ्या गोंधळाचा तिटकारा होता. ज्यांना जमत असेल त्यांनी कराव पण मला ते झेपणारं नव्हत. मी जाउन चांदोरकर सरांकडे शिकवण लावली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"का हो तुम्ही तुम्हाला 'त्या' शिकवणी वर्गात प्रवेश मिळाला नाही का?" सरांनी माझ्या वडिलांना विचारले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नाही. पोराचे तेवढी टक्केवारी नाही" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"उन्हाळी वर्ग वगैरे? मी ऐकल की 'ते' उन्हाळी वर्ग ही घेऊ लागले आहेत" सरांच 'त्या' शिक्षकावर फार प्रेम होते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"समर-क्लासेल लावले होते. पण त्या नंतर पोरगा म्हणतो की तुमच्या कडेच शिकवणी लावायची" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"वेड लागलय त्याला! अहो, मी काही हजार गणित सोडवायला देत नाही आणि मेरीट येईल याची शाश्वतीही देत नाही." सर हसत म्हणाले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पोरगा मेरिट येण तसही शक्य नाही." माझे वडिल हसत म्हणालेत. त्यांचा माझ्यावर पूर्ण विश्वास होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अहो, अस नाही. प्रत्येक पोरामधे काही ना काही असत. सगळ्यांना एक सारखं मानुन हजार गणित देण्यात काही अर्थ नाही" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्यांच म्हणण बरोबर होत. चांदोरकर सरांच्या शिकवणी एका जमान्यात फार प्रसिध्द होत्या. पण मी जेंव्हा त्यांच्याकडे शिकवित होतो तेंव्हा त्यांचे क्लासेस चालायचे पण पहिल्या इतके ते गाजत नव्हते. थोडक्यात, त्यांच्या वर्गातुन शेकड्यांनी मेरीट येत नव्हते. शिकण्या ऐवजी मार्क मिळविण्या कडे विद्यार्थ्यांचा कल वाढत होता. शिकविण्या ऐवजी होम्-वर्क किती दिल्या जातं या कडे शिक्षकांचा कल वाढत होता. याशिवाय, शिक्षक किती फि घेतात या वरुनही त्यांना शिकविता येत की नाही हे ठरवल्या जाऊ लागल. शहरातील 'ते' सुप्रसिध्द शिक्षक त्या काळात ८वी, ९वी १०वीचे पाच ते सात हजार फी घ्यायचे. (प्रत्येक वर्षीचे). गंमतीचा भाग म्हणजे 'ते' सुप्रसिध्द शिक्षक एका काळी चांदोरकर सरांचेच विद्यार्थी होते. सर नेहमी त्याबाबत विनोद करत असत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"माझाच विद्यार्थी होता तो, त्यामुळे तो यशस्वी झाला तर मला आनंदच आहे" अस ते सारखं म्हणत असत. पण मनात काही तरी चुकचुकत होत. इतकी वर्ष शिकवुन मिळालेला अनुभव आणि विद्यार्थ्यांना समजुन घेण्याची कला त्यांना अवगत होती. गणित कसं शिकवायच हे सुध्दा त्यांना ठाउक होत पण तरी विद्यार्थी असे वेड्यासारखे एक विचित्र अभ्यास करण्याच्या पध्दतीमागे का धावतात हे त्यांना बहुधा कळत नसाव. अर्थात, दुसर्‍या कुणी शिकवुच नये किंवा दुसर्‍या कोणाला शिकविता येत नाही अस त्यांना मुळीच वाटत नसे. पण नविन पध्दती प्रमाणे केवळ हुशार विद्यार्थ्यांनाच प्रवेश देणे आणि गणित शिकविण्याऐवजी हजार-हजार उदाहरणं होम-वर्ग म्हणुन देणे याचा अर्थ त्यांना लागत नसावा. या तारखेला हा धडा पूर्ण करायचा आणि या तारखेला कुठल्याही परिस्थितीत कोर्स पूर्ण करुन मग शेवटचे चार महिने नुसत्या परीक्षा द्यायच्या ही असली घोड-दौडही त्यांना समजत नसावी. काळासोबत त्यांची धावतांना दम-छाक होत होती. हे त्यांनाही कळत होत पण शिकविण्याची उर्मी जात नव्हती. शिकवणी वर्ग हा एक प्रचंड मोठा आणि अत्यंत फायद्याचा (भांडवल लागत नाही. विद्यार्थी स्वतःच हलाल व्हायला येतात!) धंदा झाला होता हे त्यांना पचनी पडत नव्हत. ते आधी स्वतः नोकरी करत आणि संध्याकाळी शिकवित असत. पुढे पुढे त्यांनी फक्त शिकवणी वर्गच घेत असत पण त्यांची फी अवास्तव नव्हती. बरीच विद्यार्थी अर्धी फी भरुन पळुन जात असत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरांची गणित शिकविण्याची पध्दत सोपी होती. पाठ्य-पुस्तका प्रमाणे ते शिकवित असत. या धड्याची ही पानं एव्हाना संपवायची म्हणजे परीक्षेतील इतक्या प्रश्नांची निश्चिंती. मग पुस्तकावरच्या प्रत्येक पानावरचं प्रत्येक उदाहरण ते फळ्यावर सोडवित असत. धड्याच्या शेवटी दिलेल्या प्रश्नमालिकेतीलही प्रत्येक प्रश्न ते सोडवुन दाखवित. त्यामुळे व्हायचं काय की गणित कस सोडवायच यासोबतच गणिताबद्दल विचार कसा करायचा हे सुध्दा विद्यार्थ्यांना समजत असे. पण यात एक महत्त्वाचा अंश असा कि विद्यार्थ्याने गृह-अभ्यास करायला हवा. स्वतः गणित सोडवुन, येणारे प्रश्न सरांना विचारायला हवेत. थोडक्यात अभ्यासाची जवाबदारी विद्यार्थ्यानेही उचलायला हवी. घोड्याला पाण्यापर्यंत नेण्याचे काम शिक्षक करू शकेल पण पाणी पिणे हे काम मात्र फक्त विद्यार्थ्याचे. हजार गणित सोडवुन घेण्यामागे घोड्याला जबरदस्ती पाणी पाजण्यासारख काहीस असाव. पण काही न उमजता यंत्राप्रमाणे हजार गणित सोडवुन प्रगती-पुस्तकावरचे आकडे जुळतातच अस नाही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(क्रमशः)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-7968163100675365620?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/7968163100675365620/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=7968163100675365620' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/7968163100675365620'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/7968163100675365620'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='चांदोरकर सर - भाग १'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-2391114327588709345</id><published>2009-03-10T19:29:00.000+05:30</published><updated>2009-03-10T17:46:47.407+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मनोगत'/><title type='text'>धुक्यातील मृगजळ</title><content type='html'>The young have aspirations that never come to pass, the old have reminiscences of what never happened.&lt;br /&gt;                    - Saki&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जवळ जवळ तीन वर्षांनी भारतात जायचा योग आला. तीन वर्षांनी मी आई-बाबांना भेटणार होतो, मित्रांना भेटणार होतो. परदेशात राहुन सात वर्ष व्हायला आलीत पण घरची ओढ तितकीच आहे. आता घर म्हटल म्हणजे ओढ असणारच नाहीतर त्याला घर म्हटल नसत! पण तीन वर्षात इतक्या गोष्टी बदलल्या होत्या की नेमक्या कुठल्या भावना मनात होत्या ते कळत नव्हत. संदर्भ बदलले होते. माझे इतरांकडे बघण्याचे आणि इतरांचे माझ्या कडे बघण्याचे दृष्टीकोण बदलले होते. मी मागल्या दिवाळीला भारतात गेलो होतो. मला परतुन तीन महिने होउनही गेलेत पण त्या प्रतिसादांचे आणि पडसादांची चाहुल मी अजुनही घेतो आहे. त्या सुरांचे नाद मला लागत नाहीत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परदेशात जायची मी कधीच स्वप्न बघितली नाहीत आणि इतकी वर्ष झालीत तरी माझ्या स्वप्नातुन माझ घर, माझे आप्तजन अजुनही जात नाहीत. म्हणुन मला प्रश्न पडतो की ही सगळी उठाठेव कशासाठी?  हे सगळं कुठे घेऊन जाणार आहे? यातुन काय सिध्द होणार आहे? पुरुषार्थ? कि भरपुर पैसा? मला संधी मिळाली आणि मी स्वतःला झोकुन दिल. याच मला यत्किंचतही दु:ख नाही. परत तशी परिस्थिती मिळाली तर मी तेच निर्णय घेईन. पण मनात संदेहाचे काटे जे रुततात त्यासाठी रुईची पान शोधतो आहे. कधी कधी वाटत की उगाचच शुंभासारखा इतका विचार करतो. काही आवश्यकता नाही. बरं रिकामा न्हावी भिंतीला तुंबड्या लावी असला प्रकारही नाही. श्वास घ्यायला फुरसत नाहीया पण थोडाही वेळ मिळाला की मन परत गुढ विचारांशी शिवा-शिवी खेळायला लागत. शांता शेळके यांची एक कविता आठवते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काळजातले अनेक अज्ञात प्रदेश&lt;br /&gt;ज्यांचे अस्तित्वही ठाऊक नव्हते आजवर,&lt;br /&gt;हलके हलके दिसत आहेत मला&lt;br /&gt;पावलांखाली नव्याच वाटा, आतबाहेर, सर्वभर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हररोज हरघडी अचानक नवे प्रश्न समोर&lt;br /&gt;जुन्या संबंधांची तेढीमेढी अतर्क्य वळणे&lt;br /&gt;चक्रव्यूहात आपले आपल्याला जपणे जोपासणे&lt;br /&gt;अनेक गोष्टींचे अर्थ आयुष्यात प्रथमच कळणे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माझा मीच आता किती शोध घेते आहे&lt;br /&gt;अज्ञाताशी जुळवते आहे रोज नवी नाती&lt;br /&gt;आतल्या आत घडत, मोडत, पुन्हा घडत&lt;br /&gt;अपरिचीत रुपे घेत आहे माझी माती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मागे म्हटल्या प्रमाणे खरच माझी सगळी स्वप्न अजुनही माझ्या घरचीच असतात. आई-बाबा, दादा, आजी-आजोबा हेच दिसतात. मी शाळेत पराग, बहार, तेजस सोबत मस्ती करतोय हेच दिसत. बास्केटबॉलचे सामने जिंकतोय हेच दिसत. जाग आल्यावर आठवणींच्या धुक्यातुन बाहेर पडायची मुळीच इच्छा होत नाही. त्या आठवणी आहेत त्यामुळे परत कधीच येणार नाहीत हे माहिती असतांना हा मनाला खेद कसला? बहुतेक तसल्या निर्मळ आठवणी पुढे कधीही येणार नाही याची जाणीव होत असावी. माझ लहानपण चार-चौघांसारखा गेल. कर्तबगार आणि प्रेमळ आई-बाबा, पाठीराखा मोठा भाऊ आणि गोष्टीतल्या सारखी आजी. मी खुप मस्ती केली. मारही बराच खाल्ला. अगदी माझ्या आजी कडुनही. माझी मित्र-मंडळीहीदांडगी होती. ठरवुन अभ्यास नाही केला आणि त्याचे परिणामही भोगलेत. पण या सगळ्यांनी मला संदर्भ दिले होते. यशा-अपयशाचे माप-दंड या सगळ्यांमुळे यांनी बांधले होते. या धाग्यांनी मला विणल होत. आता मनाचा गुंता सुटत नाहीया. तीन वर्षांनी भारतात जाऊन तो गुंता सुटेल अशी आशा करत होतो. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैत्री असो कि नाते-संबंध, ते टिकवायला सोबतीची गरज असते. माझ्या सगळ्या मित्रांना नोकर्‍या लागल्या होत्या आणि बहुतांश मुंबई-पुण्याला निघुन गेले होते. बर्‍याचश्या मैत्रिणींची लग्न झाली होती किंवा होण्याच्या मार्गावर होती. दिवाळीच्या निमित्ताने बहुतेक मित्र गावी आले होते म्हणुन ओझरती का होईना भेट झाली पण काही तरी विचित्र वाटत होत. त्या सगळ्यांमधे मी माझ्या जुन्या मित्रांना शोधत होतो. अर्थात हा माझा खुळेपणा होता. तीन वर्षाचा हा काळ सगळ्यांच्याच आयुष्यात महत्त्वाचा आणि घडामोडींचा होता. अनुभवांच्या छिन्नीचे घाव प्रत्येक मुर्तीला वेग-वेगळा आकार देते. माझी मित्र-मंडळीही आशा-आकांक्षांच्या ओझ्या खाली वाकायला लागली होती. आणि हा फरक फक्त तीन वर्षांचा नव्हता. मला परदेशात राहुन सात वर्ष व्हायला आली आहेत. अर्ध्या दशकाहुन अधिक या काळात स्वभाव बदलणे किंवा सवयी बदलणे सहाजिकच आहे. आमचे दृष्टीकोणही संपूर्णतः निराळे झाले होते. मैत्री सोबत घेतलेल्या अनुभवांच्या पायावर भक्कमपणे उभी असते. पण सोबत संपली कि रहाते केवळ ओळख. पतंगाची भरारी मांजाच्या लांबी पूर्तीच सिमित असते तस आमच्या मैत्रिच झाल होत. जुन्या आठवणींना किती वेळा  ऊत येणार? भांड्यात आता काही उरलच नव्हत! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यातुन दोन गोष्टी समोर येतात. एक, काळ पुढे जाणार आणि नदीच पाणी वाट काढुन वहातच रहाणार. आठवणींच गाठोड बांधुन पुढे चालत रहाण्याशिवाय गत्यंतर नाही. हे तत्त्वज्ञान काही नवख नाही. ज्या आठवणींच्या आल्हाददायक पाण्यात मी आजतोवर न्हात होतो त्या पाण्याच मृगजळ झाल होत. आणि माझ मन वेड्यासारख त्याचाच मागोवा घेतय. एक दिवस असा येईल कि या आठवणीही घडलेल्या घटना या सदराखाली मनाच्या कुठल्यातरी कोपर्‍यात दफ्तरबंद होतील. वयाने मोठं झाल्यावरच्या आठवणी काही वाईट मुळीच  नाहीयात पण त्या प्रखर आणि रुक्ष वाटतात. त्याच तेवढ्या रहातील याची धास्ती वाटते. आणि दुसर म्हणजे की याचा अर्थ असा तर नव्हे की मला जी हुरहुर लागली होती ती माझ्या मायदेशाशी तुटत चाललेल्या संबंधांचीच तर नव्हती? आई-बाबा आहेत आणि ते पुरेशे आहेत पण बाकी देशात जाउन काय करायच? सोबतीचे सगळे वेग-वेगळ्या मार्गानी दिसेनासे झाले आहेत. प्रवासात जसे पांथस्थ अचानक भेटतात, गप्पा होतात, हसण होत आणि जसे भेटलेत तसेच ते नाहीसे होतात. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुंता सोडवायच्या नादात आता लक्षात येतय कि सगळे धागेच नाहीसे झालेत आणि राहिलो मी एकटाच! काळाच्या लाटांनी माझी परतीच्या पाऊलखुणाच नाहीश्या केल्या आहेत. समोर जाण्याशिवाय पर्याय नाही माहिती आहे पण आता मागे वळुन बघण्याचीही मुभा उरली नव्हती त्याची खंत.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-2391114327588709345?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/2391114327588709345/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=2391114327588709345' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/2391114327588709345'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/2391114327588709345'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='धुक्यातील मृगजळ'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-6024687740083606189</id><published>2009-01-28T09:34:00.001+05:30</published><updated>2009-01-28T23:54:59.184+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दीर्घकथा'/><title type='text'>निर्माल्य - भाग ५  (अंतिम भाग)</title><content type='html'>माई हॉस्पीटल मधे पोचल्यात तर त्यांना वातावरण तंग होत. सुनेचे वडिल, भाऊ आणि एक तीशीचा तरूण खोलीबाहेर उभे होते. तिघांपैकी कोणीही माईंशी काहीच बोलल नाही.  आई आत सुनेपाशी बसली होती. माई घाई-घाईनी खोलीत गेल्या. विजय बाहेरच थांबला.  सुन निपचिप पडली होती. तिला सलाईन लावलेली दिसत होती. पण कुठे दुखल्या-खुपल्याच दिसत नव्हत. माईंना थोड हुश्श झाल. &lt;br /&gt;"काय झाल पोरी?" माईंनी प्रेमाने विचारल. &lt;br /&gt;सुनेनी काहीच उत्तर दिल नाही. तिने डोळे मिटुन घेतलेत आणि तिच्या डोळ्यातून अश्रु वाहु लागलेत. &lt;br /&gt;"रडु नकोस बाळा. मी आहे ना सोबतीला" &lt;br /&gt;तरी सून काहीच बोले ना! सुनेची आई सुध्दा काही बोलायला तयार नव्हती. &lt;br /&gt;"काय झाल पोरी? सांगशिल का?" माईंनी पुन्हा विचारल. &lt;br /&gt;"श्रीकांतला विचारा" सूनेची आई रागाने म्हणाली. &lt;br /&gt;"श्रीकांत?" माईंनी आश्चर्याने बघु लागल्या. "श्रीकांत आहे इथे" माईंनी पुढे विचारल. &lt;br /&gt;"हे जे सगळं दिसतय ना ती सगळी श्रीकांतची करणी आहे" सुनेची आई गरजली. &lt;br /&gt;माई थोड्या ताठरल्यात. त्या मनातल्या मनात काय झाल असेल याचे घाई-घाईने हिशोब करू लागल्यात. &lt;br /&gt;पोलिस स्टेशनात पाहुणचार चालला असेल त्याचा. पहिली फेरी नक्कीच नसावी त्याची" सुनेची आई पुढे म्हणाली. &lt;br /&gt;"अहो काय बोलताय? श्रीकांत पोलिस स्टेशनमधे? पोरी, बोल ग!." माईंनी काकुळतेनी सुनेकडे बघितल. सुनेच्या आईचे शब्द त्यांना नकोसे झाले होते. &lt;br /&gt;"ती काही बोलणार नाही. मी सांगते तुम्हाला काय झाल ते. तुमचा श्रीकांत फार नावाजलेला आहे तुम्हाला माहितीच असेल. पण त्याची इतकी मजल जाइल अस कधी वाटल नव्हत. घरच्या बायका-पोरींवरच नजर टाकायला लागला? इतक पडाव माणसाने?"&lt;br /&gt;"असं नका बोलु. श्रीकांत थोडा बिघडला असेल पण त्याची नजर वाईट नाही. आणि घरच्या पोरी-बाळी म्हणजे कोण? सुनेबद्दलच बोलताय ना तुम्ही? तो फार आदर करतो सुनेचा. अविनाश गेल्या पासुन तोच पाठीराखा आहे तिचा" माईंना बोलतांना श्वास लागत होता. हे सगळ अनपेक्षित होत. नेमकं काय घडलय हे माईंना अजुनही कळेना. &lt;br /&gt;"पाठीराखा! पुत्र-प्रेम आंधळ असत हेच खर."&lt;br /&gt;"अहो वहिनी, स्पष्ट पणे सांगा काय झाल ते. कुत्सित बोलण पुरे झालं" &lt;br /&gt;आतापर्यंत सुनेचे वडिल आणि भाऊ खोलीत आले होते. तो तिशीचा पुरुष दाराशी ताटकळत उभा होता. &lt;br /&gt;"श्रीकांतने पोरीशे छेडखानी केली" सुनेचे वडिल शांतपणे म्हणालेत. त्यांच इतक शांत वागण विपरीत होत. &lt;br /&gt;माई वीज पडल्यासारख्या स्तब्ध झाल्या. त्यांचा चेहरा पांढरा फटक पडला.  त्यांना काय बोलाव ते कळेना. श्रीकांतची इतकी हिंम्मत? दारू-काडी इतक तर आपल्याला माहिती होत. स्वतःच्या सख्ख्या वहिनीवरवाईट नजर टाकण्या इतका बिघडला असेल यावर माईंचा विश्वासच बसेना. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"त्याला दादरच्या पोलिस स्टेशन मधे दिलय" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हे अशक्य आहे. श्रीकांत कधीही अस करणार नाही. मला माझा श्रीकांत पूर्ण माहिती आहे. आई आहे मी त्याची. तुम्हाला काही तरी गैरसमज झालाय. पोरी, सांग मला की खरच अस झालय का ते." त्या कश्या-बश्या बोलल्यात. &lt;br /&gt;"माई, हे असलं बोलायला हा काही चित्रपट नाही. तो आत्तापर्यंत काय करत होता हे तरी तुम्हाला नेमक ठाऊक होत का? मग तो इतका पडु शकतो हे तुम्हाला कस कळणार?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पोरी, बघ माझ्याकडे. उत्तर दे मला. मी काय विचारतेय" माईंनी सुनेकडे रोखुन बघत होत्या. त्यांच्या डोळ्यातून अश्रु संथपणे वहात होते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आणि सुमा काही तुम्हाला उत्तर देणार नाही या. ती तुमची कोणीच नाही."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंनी असाह्यपणे खोलीत नजर फिरवली. पण त्यांना कुठुनही कसलीही मदत मिळणार नव्हती. सुनेचे वडिल हात पाठीमागे बांधुन माईंना बघत होते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"निघा आता" सुनेची आई गरजली. "लग्न लावायला निघाल्या होत्या" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनेचे हुंदके आता वाढायला लागले होते पण तिच्या तोंडुन एक शब्द बाहेर पडायला तयार नव्हता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंना आजु-बाजुच ऐकु येण बंद झाल. कानात सुं आवाज येऊ लागला. त्यांच्या तोंडुन रडण्याचा आवाज मुळीच येत नव्हता जणु हंबरडा फोडायला त्यांना भीती वाटत असावी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माई भग्न अवस्थेत खोलीतून बाहेर पडल्यात.  त्यांचा पदर पडल्याचाही त्यांना पत्ता नव्हता. माईंना अस बघुन विजय चांगलाच थिजला. त्याला आतला आरडा-ओरडा ऐकु येत होता पण त्याला संदर्भ लागला नव्हता. तो तरूण अस्वस्थपणे माईंकडे बघत होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय माईंच दंड पकडुन बाकाकडे नेण्याचा प्रयत्न करु लागला पण माईंनी विजयला झिडकारले. त्यांच्या अंगात अचानक अवसान आल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"दादरच्या पोलिस चौकीत चल" त्या विजयला त्वेषाने म्हणाल्यात आणि तरातरा इस्पितळातून बाहेर पडु लागल्यात. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय माईंमागे धावला. "माई, तुम्हाला माहितीय का कुठेय चौकी?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंनी मान हरवली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"जवळपासच असेल. मी पटकन कोणालातरी विचारून येतो. तुम्ही आत बसा तो पर्यंत" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नको, मी इथेच उभी ठिक आहे" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय पत्ता विचारून येईपर्यंत माईंनी स्वतःला सावरल होत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मला वाटलच जवळपास असेल. इथेच गोखले रोडवर आहे" विजय बोलला. मग थोडा चाचरत तो पुढे म्हणाला " श्रीकांत दादा.." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंनी काहीच उत्तर दिल नाही. त्यांनी विजयकडे शांतपणे बघुन नुस्ता चलायचा नुसता इशारा केला. त्यांचे डोळे लाल झाले होते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दादरच्या पोलिस चौकीवर बरीच गर्दी होती. विजय किंवा माईंपैकी कोणी कधीच असल्या वाटेला गेल नव्हत त्यामुळे चौकीत नेमक कोणाला आणि काय विचारायच ते कळेना. पण तेवढ्यात चौकीतून एक तीशीचा इंस्पॅक्टर धावत बाहेर आला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"माई, या" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ओळखल नाहीत का तुम्ही मला" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" श्रीराम?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नाही मी त्याचा लहान भाऊ अशोक"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" मी आत्ता तुमच्याकडेच येणार होतो श्रीकांतल घेऊन. तुम्ही इथे याव अशी माझी मुळीच इच्छा नव्हती"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आत या तुम्ही" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ए, पाणी आण रे लौकर"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काळजी करू नका. श्रीकांतला इथे आणल्या बरोबरच मी त्याला ओळखल. त्याला आत केलच नाही" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंना काय बोलाव ते कळेना. "आत करण" म्हणजे मारहाण करण तर नव्हे या विचाराने त्यांच्या अंगावर काटा आला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"फार लहान असतांना बघितल होत पण अविनाश सारखाच दिसत"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अविनाशच ऐकुन फार वाईट वाटल" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माई आत आल्या तर श्रींकांत खोलीच्या टोकाशी बाकावर मांडी घालुन बसला होता. तोंडात रंगलेला खर्रा आणि वरच्या गुंड्या उघड्या टाकलेला तो शर्ट बघुन माईंचा पारा सणसण तापला. त्या तरातरा त्याच्याकडे चालत गेल्या. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंना बघुन श्रीकांतने मान खाली टाकली. माईंनी त्याच्या जवळ जाऊन त्याला सणसणीत झापड मारली. श्रीकांत बाकवरून कोलमडुन खाली पडला. तो आश्चर्याने माईंकडे बघु लागला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आई, तु मला मारतेयस?" तो कसातरी बोलला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नालायका, अविनाशच्या ऐवजी तू त्या बसमधे का नव्हतास" त्या श्रीकांतला अजुन मारण्याचा प्रयत्न करू लागल्यात पण पहिली झापड मारण्यात त्यांचा सगळा त्राण निघुन गेला होता. श्रीकांतला मारण्यात त्यांच्याच हाताल लागत होत पण अंगातल्या त्वेषाला तर आत्त कुठे ऊत येत होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नुस्ता बसुन तुकडे तोडतोस आणि बाहेर उनाडक्या. हे असल काही करण्या आधी मीच मारून टाकायला हव होत" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीकांतही रडत होता पण तो माईंना अडविण्याचा मुळीच प्रयत्न करत नव्हता. तो निमूटपणे मार खात होता. माईंचा आवेश बघुन इतर कोणी त्यांना थांबविण्याचा प्रयत्न करीत नव्हत. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंच्या बांगड्या फुटत होत्या आणि त्यांची मनगट रक्ताळली होती. त्यांनी शेवटी थकुन जमिनीवर फतकर मारल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पोलिस चौकीत असल प्रकरण नविन नसाव कारण पोलिस अधिकारी, विजय आणि एक महिला अधिकारी माई पडल्या वगैरे तर सावरायच्या तयारीत असलेली सोडली तर बाकी कारभार संथपणे चालू होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीकांतने शेवटी माईंचे दोन्ही हात घट्ट धरले आणि केविलवाण्या सुरात त्याने विचारले "आई, काय चुकल माझ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुला काय वाटत मी काय केलय ते?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"वहिनीकडे असं बघण्याची तू हिम्मतच कशी केलीस? कोणी शिकवल तुला हे सगळ? तू असल काही करणार आहेस माहिती असत तर तू पोटात असतांनाच विहिरीत जीव दिला असता. किती छळशील. मोठ्याने जाऊन छळल आणि लहाना राहुन छळतो" अस म्हणत त्यांनी हंबरडा फोडला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीकांत माईंकडे रोखुन बघु लागला. त्याच्या डोळ्यातुन अश्रु वहाण थांबल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आई, असा वाटलो का मी तुला?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंनी काहीच उत्तर दिल नाही. त्या रडतच होत्या. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आई, वहिनीला दुसर्‍या पुरुषासोबत बघुन मी काय कराव अस वाटत तुला" श्रीकांतनी कडक शब्दात विचारला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीकांतने माईंचे दंड पकडुन गदागदा हलवल. "आई, मी एकदा नाही तीनदा त्या माणसा सोबत तीला वेगवेगळ्या जागी बघितल" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"लक्षात येतय मी काय म्हणतोय?" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"शेवटी आज मला सगळ असह्य झाल आणि मी पुरुषाला मारायला धावलो. त्या भानगडीत वहिनीला लागल असाव पण पोलिसांनी मलाच धरल"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंना कळेचना की श्रीकांत बोलतोय ते खर मानायच कि सुनेच! पण सुन तर काहीच बोलली नाही. त्या विस्मित होऊन श्रीकांतकडे बघु लागल्यात. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नंतर सुमा वहिनीचे वडिल आले होते चौकीत. तक्रार नोंदवायला पण अशोक दादानी त्यांना परतावुन लावल. पण जाता-जाता त्यांनी मला धमकावल की ते त्यांच्या मुलीच लग्न माझ्याशी कधीच होऊ देणार नाहीत"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आई, ऐकतेयस का? तु वहिनीच लग्न माझ्याशी लावणार होतीस अस त्या लोकांना वाटलच कस? इतके नालायक लोक आहेत ते.  तिच्या माहेरचे वहिनीच लग्न लावायला निघालेयत. आपल्याला न विचारता! वहिनी आपल्या घरची सुन ना?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंनी काहीच उत्तर दिल नाही. &lt;br /&gt;"पण सुमा च्या आई-वडिलांशी लग्ना बद्दल कधी बोललेच नाही" अस काहीस पुटपुटत माईं स्तब्ध झाल्यात. प्लॅस्टिक च्या बाहुली सारख्या त्या शुन्यात दृष्टी लाउन तश्याच बसुन राहिल्यात.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(समाप्त)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;br /&gt;हि माझी पहिली दिर्घकथा वाचकांना आवडेल अशी मी आशा करतो. आपले अभिप्राय अवश्य कळवावेत हि नम्र विनंती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुध्दलेखनाच्या असंख्य चुका आहेत पण वाचकांनी त्या पदरी घ्यावात. आणि चुका दुरुस्त करण्याची सोपी पध्दत माया-जाळावर उपलब्ध असेल तर कृपया मला कळवावे. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-6024687740083606189?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/6024687740083606189/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=6024687740083606189' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/6024687740083606189'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/6024687740083606189'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/01/blog-post_28.html' title='निर्माल्य - भाग ५  (अंतिम भाग)'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-3837640426041140448</id><published>2009-01-21T07:26:00.000+05:30</published><updated>2009-01-21T07:26:01.046+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दीर्घकथा'/><title type='text'>निर्माल्य - भाग ४</title><content type='html'>काळ कधी सरकतो कळत नाही. झाडांवरची गळलेली पान आणि चेहर्‍यावरच्या वाढत असलेल्या सुरकुत्या जणु फक्त साक्षीला असतात. अविनाश ला जाऊन पहाता-पहाता दीड वर्ष झाल. डोळ्यातून अश्रुंची रहदारी थांबली असली तरी डोळे कोरडे झाले नव्हते. जाणारा नेहमीच सुखात असतो कारण मृत्यु जे मागे राहिले त्यांनाच छळतो. माईंना शाळेची बरीच कामं असत.  त्या व्यापात त्या मग्न असल्या तरी विषण्णता त्यांच्या हृदयात माहेरी आलेली होती. रंग उडालेल्या सुनेला बघुन त्यांचा जीव थोडा-थोडा होत असे. सुनेच्या आयुष्याची पहाट होता-होताच काळरात्र झाली हा विचार त्यांची दुसरी सावली बनला होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्यांचा स्वतःचा संसार तर सावळा गोंधळच होता पण नावाला का होईना नवरा तर होता. शिवाय दोन सोन्यासारखी पोर होती. माईंच्या मनात नेहमी द्वंद्व चालू असे. अण्णांच जे काही झाल ते काहे व्हायला नको होत. नियतीचा खेळ वगैरे तत्त्वज्ञान ठिक आहे पण अण्णांनी आणि माईंनी कोणाचही कधीही वाईट केल नव्हत तर दोघांची आयुष्य अशी भेसूर का व्हावीत या प्रश्नांशी माई भांडत असत. त्यांच्या थंडगार संसारात अंतरीच्या घालमेलीची त्यांना उब मिळत असे. पण स्वतःच्या पोराचा असला करूण अंत आणि समोर जिवंत शरीरात निर्जिवतेनी वावराणारी सून बघुन त्यांचे मन सुन्न झाले होते. त्या दु:खाच्या भाराखाली त्यांच स्वतःशीच बोलण बंद झाल होत. तत्त्वज्ञानाची गंमत अशी असते की जीवनातल्या दु:खांची उत्तरे तत्त्वज्ञान्यांकडे मुळीच नसतात. म्हणुन जग मिथ्या आहे आणि हे दु:ख दु:खच नाही किंवा ही सगळी देवाचीच करणी आहे असली बाष्कळ बडबड करत असतात. मी मी म्हणणार्‍या तत्त्वज्ञानी माणसाला तरूण मुलाच्या देह बघावा लागणार्‍या आई समोर उभ कराव आणि विचाराव की मृत्युनंतरच्या अनंत सुखासाठी जगण्याचे दु:ख देणारी ही कसली माया? आणि हा खेळ दाखवणारा असा कसला हा देव? कढत अश्रुंचा खारटपणा काढायची 'माया' जो करून दाखविल तो खरा देव! पण त्या भानगडीत देव पडायचा नाही. आणि या प्रश्नाची उत्तर देण्याच्या वाटेला तत्त्वज्ञानी मंडळी मुळीच भटकायची नाही. या प्रश्नांची उत्तरे नाहीत. कारण हे प्रश्नच प्रश्न नाहीत. हे तर केवळ दु:ख आहे. अनंत आणि अथांग. समुद्रासारख. कुठल्या काठा पासुन आरंभ झाला ते माहिती नाही आणि कुठे अंत होणार याचीही कल्पना नाही. सतत येणारी वादळ गिळंकृतही करत नाहीत. प्रत्येक वादळ मनाचा एक-एक टवका फाडुन घेउन जात. वादळ गेल की हे मन परत स्वप्न बघायला लागत आणि सत्र पुन्हा सुरु.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंना मरायचीही भीती वाटु लागली होती.   मेल्यानंतर भूत होऊन इथेच अडकुन राहिलो तर?  त्यामुळे त्या सगळ्यांची काळजी घ्यायची पराकाष्ठा करीत असत. त्यांना सारखा वाटे वाफेने धुसर झालेल्या आरश्यावर काही लिहाव तस त्यांच आयुष्य गेलं. क्षणभंगुर, एकाकी, उदास, श्रांत. वाफ उडुन गेल्यावर आरश्यावर लिहिल्या पैकी काहीच उरत नाही. उरतो फक्त प्रतिबिंब बघवत पण नाही आणि त्या प्रतिबिंबाला टाकुन कुठे दूर जाताही येत नाही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अविनाश गेल्यानंतर दोन महिन्यातच माईंनी सूनेला जोरा करून शाळेत परत नोकरीला धाडल. माई स्वतः शाळेत असतांना सून घरी वठत चाललेल्या लाकडासारखी पडली आहे याची माईंना फार काळजी लागलेली असे. शाळेत परत नोकरी सुरु झाल्यानंतर सुनेत थोडा-थोडा बदल होऊ लागला.  आजकाल विचारलेल्या प्रश्नांची उत्तरे वाक्यांमधे यायला लागली. आधी तर फक्त हो किंवा नाही यातच संवादाची घडी होत असे. अण्णांनी "अविनाश आताशा दिसत नाही" अस परवा विचारल. त्यामूळे अविनाश गुडुप झालाय याची नोंद त्यांनी दिड वर्षांनी का होईना घेतली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीकांतच गाड अजुनही चालूच होत नव्हत.  बाहेरुन माईंना बर्‍याच गोष्टी ऐकु येत असत. उनाडक्या करण्यातच त्याचा वेळ जात असे. मग त्याच तोंड पानाने रंगलेल दिसु लागल. सिगारेटचा वास मधे मधे येत असे. त्यासाठी तो पैसे कुठुन आणत होता ते मात्र कळत नसे. हा जुगार वगैरे खेळतो का अशी शंका माईंना येऊ लागली. वडिल भाऊ गेल्यावर त्यात फारसा बदल झालेला नव्हता. घराबाहेर तो काय काय करत होता तोच जाणे पण त्याचं वागण बेदरकार किंवा मुजोर कधीच नव्हत. तो घरी सुता सारखा सरळ वागत असे. विचारलेल्या प्रश्नांची तो  उत्तरे देत असे. अविनाश असे पर्यंत तो अविनाशचही ऐकत असे.  नुकतच कॉलेज पूर्ण केल्याच त्याने माईंना सांगितल. सर्टिफिकिटही दाखवल. तो त्या दिवशी बराच वेळ देवघरात बसुन माईंशी बोलत होता. आता तो नोकरी शोधतोय आणि लौकरच नोकरी लागेल त्याला. तो आपणहुन अविनाश च्या कामावर जाऊन आला होता. काय खर काय खोट माईंना कळत नव्हत.माईंचा त्या सर्टिफिकिटवरच मुळी विश्वास नव्हता. पण त्यांनी श्रीकांतला काही उलट प्रश्न विचारले नाहीत. अंतरी त्यांना भीती होती की त्यांच्या श्रीकांतबद्दलच्या शंका खर्‍या निघाल्यात तर? त्यांच हे वागण श्रीकांतच गाड रुळावर नसण्याच कारण होत की त्यांचा स्वतःला जपण्याचा प्रयत्न होता कोण जाणे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीकांतच जे व्हायच ते होईल. त्यांना सध्या सुनेची काळजी होती. त्यांच्या डोक्यात एक नविन विचार पिंगा घालत होता. सुन एवढी तरणी आहे तर तिच पुन्हा लग्न लाउन द्यायच. आताशा समाजहि पुढारला होता. आणि पहिला नवरा मेला म्हणुन तिने का उरलेल आयुष्य कुढत काढाव? म्हणुन त्यांनी एकदा ठरवुन सुनेजवळ तो विषय काढला. पण काहीही न उत्तर देता ती खोलीत चालली गेली. जखम झाली असली तरी मलम लाउन पुढे जाणच भाग असत. तिला ते समजावुन सांगण कठिण होत. सुनेच्या लग्नाच्या विचाराने त्यांच्या मनाला हुरहुर लागली. तीचा संसार परत चालू होणार याचा त्यांना आनंद होत असला तरी घरची पोरगी परघरी जाणार याची त्यांना काळजी वाटत होती. कुठली मुलं विधवेशी विवाह करायला तयार होतील किंवा विधुर मुलंच बघायला लागतील का इत्यादी बरेच गोष्टींवर त्या विचार करू लागल्यात. त्यांच्या ओळखीत विधवा विवाह झाला नव्हता.  मग त्यांनी विचार केला की सुनेच्या आई-वडिलांशी या बद्दल बोलाव. त्यांना काही आक्षेप नसणार याची माईंना खात्री होती तर होतीच पण एकाहुन तीन डोकी बरी!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माई नुकत्याच शाळेतून आल्या होत्या. शनिवारी म्हणुन दुपारची शाळा भरत असे. सून आज संध्याकाळी दिवेलागणीला येणार होती. ती सकाळीच माहेरी गेली होती. पुढे मुंबईत कोणा नातेवाईका कडे त्या सगळ्यांना जायचे होते. आल्यावर माईंनी अण्णांसाठी चहा केला व त्या वर्‍हांड्यात विश्रांती घेत बसल्या होत्या. स्वयंपाक काय करायचा असला काही त्या विचार करत होत्या.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अहो, आज कसली भाजी करू?" माईंनी अण्णांना विचारल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुढुन काहीच उत्तर आल नाही. माईं मोठ्ठा उसासा सोडत उठल्या. असला एकला संवाद काही नविन नव्हता मग उसासा सोडायला काय झाल या विचाराने माईंना थोडं हसु आल. तेवढ्यात शेजारचा विजय "माई, माई" ओरडत धावत आला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काय झाल रे बाळा?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"माई, चला लौकर तुम्ही?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हॉस्पिटल मधे"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अग बाई, काय झाल रे?" माईंनी चकित होऊन विचारले. त्यांच्या पोटात खड्डा पडला. श्रीकांतचा दोन दिवस झाले पत्ता नव्हता पण त्याच अस गुडुप होण काही नविन नव्हत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"चला तर तुम्ही"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"माई, वहिनीला दाखल केलय?" विजय घाबर्‍या घाबर्‍या म्हणाला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कोण वहिनी?" माईंना कळेचना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सुमा वहिनी"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंनी डोळे विस्फारले. ते बघुन विजय अजुन घाबरला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बर तुम्ही आधी इथे बसा"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे, चला काय, बसा काय? काय झाल नीट सांग विजय. इथे कोणी लहान नाही या" माईंनी स्पष्ट शब्दात विचारल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मला काय झाल नेमक माहिती नाही. मी शाळेतून परत येतांना वहिनींचा भाऊ दिसला.  त्यानी तुम्हाला निरोप द्यायला सांगितल की वहिनींना दादरच्या हॉस्पिटलात दाखल केलय. तो म्हणाला काळजीच कारण नाहीया पण तुम्हाला तातडीने बोलावल आहे"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काळजीच कारण काय नाही डोंबल. हॉस्पिटलात काय गंमत म्हणुन जातात का लोक?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजयला काय उत्तर द्याव कळेना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंनी घाई-घाईने वहाणा चढवल्यात व त्या स्टेशन कडे चालू लागल्यात. विजय त्यांच्या पाठी मागे येत होता.&lt;br /&gt;(क्रमशः)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-3837640426041140448?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/3837640426041140448/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=3837640426041140448' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/3837640426041140448'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/3837640426041140448'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/01/blog-post_21.html' title='निर्माल्य - भाग ४'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-7410545252071769259</id><published>2009-01-17T08:54:00.000+05:30</published><updated>2009-01-17T08:54:01.067+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्कृत रचना'/><title type='text'>॥जागृहि जागृहि॥</title><content type='html'>आशया बध्दते लोकः कर्मणा परिबध्द्यते।&lt;br /&gt;आयुक्षयं न जानाति तस्मात् जागृहि जागृहि॥१॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्मदु:खं जरादु:खं जायादु:खं पुनः पुनः ।&lt;br /&gt;अंतकाले महादु:खं तस्मात् जागृहि जागृहि॥२॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काम क्रोधौ लोभ मोहौ देहे तिष्ठन्ति तस्करा:।&lt;br /&gt;ज्ञानरत्नापहाराय तस्मात् जागृहि जागृहि ॥३॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐश्वर्यं स्वप्न संकाशं यौवनं कुसुमोपमम्।&lt;br /&gt;क्षणिकं जलमायुष्च तस्मात् जागृहि जागृहि ॥४॥&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-7410545252071769259?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/7410545252071769259/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=7410545252071769259' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/7410545252071769259'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/7410545252071769259'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='॥जागृहि जागृहि॥'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-6244508556204289343</id><published>2008-12-13T09:36:00.000+05:30</published><updated>2008-12-13T09:36:00.803+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघु-कथा'/><title type='text'>घर</title><content type='html'>मी आणि बाबा अमरावतीहुन येत होतो. अमरावतीला माझी आत्या रहात असे. बाबांची सगळ्यात मोठी बहिण. अमरावतीचा रस्ता फारच दळिद्री होता. बर्‍याच वर्षात रस्त्याची डागडुजी झाली नव्हती. त्यामुळे साधारण चार तासाच्या प्रवासाला सहा तास आरामात लागत असत. आम्ही सकाळची बस पकडली होती. पण सकाळची बस पकडली की माझ पोट नेहमी खराब होत असे. माझ पोट बस सुरु झाल्यापासुन ढवळायला लागल. पेट्रोल चा तो जळका वास आणि रस्त्यातील खड्डे म्हणजे मला कधी घरी पोचू अस झाल होत. प्रत्येक खड्डा जणु आमची प्रेमाने विचारपूस करत होता. मी झोपण्याचा प्रयत्न करत होतो. पण माझा डावा डोळा फडफडत होता.. अस कधी होत नसे. मी आपला परत खड्डे मोजु लागलो. शेवटी रडत-खडत आमची बस शहरात पोचली. अंगावर थोड सामान होत म्हणुन आम्ही रिक्षा केली. माझी सारखी चुळबुळ चालू होती. कधी घरी पोचीन अस झाल होत. आम्ही गल्लीत आलो तर गल्लीत सामसूम होती. आमच्या घराच फाटक सताड उघड होत. आमच्या घराच्या बाहेरच्या अंगणात सीताफळाच झाड होत. पोर कधी कधी फळांमागे सरळ फाटक उघडुन आत येत असत. तसलीच काही तरी भानगड असावी. मी उतरुन दारापाशी गेलो, बाबा रिक्षेवाल्याला पैसे देत होते. मी दाराजवळ पोचलोच तोच माझा हृदयाचा ठोका चुकला. दाराला कुलुप नव्हत आणि घराचे दार किलकिल उघड होत. मी हळुच सामान खाली ठेवल. बाबा माझ्या मागे येऊन उभे होते. माझ पोटं ढवळण स्विच बंद कराव तस थांबल होत. मी दार ढकलायला हात पुढे नेला तेवढ्यात घरातुन वीट पडण्याचा आवाज आला. माझा हात दारापर्यंत गेलाच नाही. काही क्षण असेच गेलेत. मी वळुन बाबांकडे बघितल. बाबा बारकाईने घराच्या खिडक्यांच निरिक्षण करत होते. त्यांच्या कपाळावर आठ्यांच जाळ पसरल होत. खिडक्या सगळ्या घट्ट बंद होत्या. त्यांनी माझ्याकडे बघितल. आम्हा दोघांच्या लक्षात आल कि घरातून कोणी तरी आमची चाहूल घेतय. बाबा माझ्या जवळ येऊन कानात कुजबुजले. " चिन्मय, एक काम कर. मागच्या गल्लीत जा आणि तिथुन भिंतीवरून चढुन गच्चीत ये. मी तो पर्यंत शेजारच्या आणि आपल्या घरामधल्या भिंतिवरुन चढुन पुढल्या बाजुनी गच्चीत येतो. आजुबाजुला इतकी शांतता होती की त्यांच कुजबुजण गल्लीच्या टोकाशी ऐकु गेल असेल. मी हळु-हळू एक पाऊल मागे टाकत अंगणाबाहेर आलो आणि मागच्या गल्लीकडे मी धूम ठोकली. बाबा तो पर्यंत समोरून भिंतीवरून चढण्याचा प्रयत्न करत होते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमचं घर फारस मोठ नाही. प्रशस्त होत पण मोठ नव्हत. शेजारच्या आजोबांनी आणि माझ्या आजोबांनी मिळुन ते घर घेतल होत. शेजारच्या आजोबांचा वाटा मोठा होता. आमच्या घरात मध्यभागी अंगण होत आणि तिन्ही बाजुंनी घराच्या खोल्या अंगणात उघडत असत. चौथ्या बाजुला न्हाणीघर होत. डाव्या अंगानी गच्चीवर जायला जिना होता.  वरच्या मजल्यावर अजुन दोन खोल्या आणि गच्ची होती. घराच्या मागल्या बाजुला एक लहानशी बोळ होती. तीत बरीच झाडी आणि गवत वाढल होत. माझा बेत त्या गल्लीतून घराच्या मागल्या बाजूनी वर चढण्याचा होता. एक मजलीच घर होत त्यामूळे चढता येण शक्य झाल असत. मी मागल्या बोळात उभ राहून नेमक कुठुन आणि कस चढायच याचा विचार करत होतो. काहीतरी धाडसी कृत्य करणार या विचारानी माझ्या अंगावर रोमांच आला होता. चढायच्या आधी मी भिंतीला कान लाऊन आडोसा घेतला तर घरातून अगम्य असा थड-थड असा आवाज येत होता. मी पाईपला धरून वर चढु लागलो तर तो आवाज वाढत गेला. मी गच्चीवर पोचलो तर घरभर विचित्र वातावरण होत. थड-थड आवाज तर येतच होता आणि कसला तरी जळण्याचा वास येत होता. सगळी कडे जळमट लागली होती. भिंतींवरून काहीतरी ठिकठिकाणी लोंबकळत होत. मी निरखुन बघितल तर कोणीतरी पोपडे खरचचवून काढले होते.आम्हाला जाऊन एक आठवडाही झाला नव्हता त्यात घराची एवढी अवदशा ? वरच्या दोन खोल्याच्या दारांवर व खिडक्यांवर गडद पोपटी रंगाचे फुलाफुलांचे पडदे घट्ट लावले होते. त्यामागे गाद्या असाव्यात. बहुतेक आवाज बाहेर जाऊ नये म्हणुन असाव. म्हणजे फक्त खालच्या घरात नव्हे तर वरच्या खोल्यांमधेही कोणीतरी आहे या विचारानी मी सावध झालो. पण घरात अस कोंडून घेऊन ही लोक नेमक काय करतायत ते कळत नव्हत. बाबा समोरून चढून येणार होते ते अजुन पोचलेच नव्हते. खरतर घराच्या समोरच्या बाजुनी चढण सोप होत. त्यांना समोरून धरल तर नाही या विचारानी मला घाम फुटला. तसेही ते गच्चीत भेटणार होते की मधल्या चौकात ते त्यांनी सांगितलच नव्हत. वाट तरी किती बघायची? गंमत-जंमत थोडीच चालली होती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मी मांजरीच्या पावलांनी जिना उतरत मधल्या चौकात आलो. थड-थड आवाज घड्याळाच्या काट्याप्रमाणे येत होता. मधल्या चौकातला पाळणा काढून ठेवला होता. कुंडीतली झाड जळून गेली होती. रॉकेल टाकुन जाळली होती. बहुधा तोच वास असावा. रॉकेल टाकुन झाड जाळावी या कल्पनेनी माझ्या अंगावर काटा आला.  च्यायला चालल काय आहे? मला घरातून पावलांची आवाज ऐकु येऊ लागले. सिमेंटच्या पोपड्यावर कसलीतरी खरखरीत पाऊल पडत होती. न्हाणीघराच्या दरवाज्यांना मोठ्ठ कुलुप लावल होत. स्वयंपाकघरात जाणारा दरवाजा बाहेरच्या दरवाज्यासारखा किलकिला उघडा होता. संरक्षणासाठी हातात काहीतरी हव म्हणुन मी शोधाशोध करू लागलो. पण काहीच मिळेना. माझ्या अचानक लक्षात आल कि घरातून येणारे आवाज थांबले आहेत. थड-थड आवाजही थांबलाय. माझ्या शोधा-शोधीत माझी चाहूल आतल्यांना लागली असावी. आता मात्र जास्त वेळ घालविण्यात अर्थ नव्हता.  मी तडक स्वयंपाकाघराच्या दरवाज्याकडे सरसावलो. क्षणभर मी दरवाज्यापुढे रेंगाळलो. आत काय असेल? कोण असेल? हे सगळ गुढ काय आहे? बाबा कुठेयत? उगाच शिवाजी बनुन इथे आलो. आधी दोन-चार लोकांना एकत्र करूनच यायला हव होत. पण आता मागे फिरण नव्हत एवढ नक्की. आता आर-या-पार!&lt;br /&gt;डोंबल आर-या-पार. हातात शंख आणि चाललो मी चोरांना पकडायला. पण घरात चोर आहेत कशावरून? विक्षिप्त विचारांनी डोक्यात पिंगा घातला होता.&lt;br /&gt;शेवटी मी किलकिला दरवाजा हळुच ढकलला. घरात अंधार होता. पण अर्धवट उघड्या दरवाज्याच्या प्रकाशात भिंतींच्या वीटा दिसत होत्या.  मी डोकावून उजवीकडे नजर टाकली तर देवघराच्या दारातून कोणीतरी माझ्याकडे डोकावून बघत होत. ती नजर स्थिर होती आणि इतक्या दूरून मला त्या खुनशी नजरेनी थंड केल. माझ्या डाव्या डोळ्याची पापणी भीतीनी फडफडु  लागली पण ती नजर स्थिरच होती. मी खालती बघितल तर मला त्या आकृतीच्या हातातली कुर्‍हाड पुसटशी दिसली. माझा मेंदू गुंग झाला होता आणिहृदय छातीतून उडी मारून पळून जायची तयारी करत होत. माझ्या पायाला काहीतरी ओल लागल. रक्त होत ते! मी ओरडण्याचा प्रयत्न करू लागलो. पण भीतीनी घशातून आवाजच फुटेना. तोंडाला कोरड पडली होती. तेवढ्यात कुठुनतरी चिन्मय चिन्मय हाक ऐकु येऊ लागली. म्हणजे बाबा आलेत की काय?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काय झाल बाळा?" बाबा मला हलवुन उठवत होते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मी खडबडुन जागा झालो. अजुन बस नागपूरला पोचायचीच होती. हे सगळ स्वप्न होत या विचारानी मला हायस वाटल.&lt;br /&gt;पाणी हवय का बाळा?"  बाबांनी विचारल.  आजुबाजुची बरीच मंडळी माझ्याकडे बघत होती. सगळ्यांसमोर बाबा मल 'बाळ' म्हणत होते त्याची मला थोडी लाज वाटत होती.&lt;br /&gt;"काही तरी विचित्र स्वप्न पडल होत" मी म्हटल.&lt;br /&gt;"नशिबवान आहेस. खड्ड्यातून इतक अंग  घुसळत असतांना तुला बरी स्वप्न पडतात!" बाबा हसत म्हणाले.&lt;br /&gt;परत थड-थड आवाज येऊ लागला. समोरच्या सीटवर बसलेल्या कोणाचा तरी स्टील चा डब्ब्याचा तो आवाज होता. त्या डब्ब्यातून तेल गळुन माझा पाय माखला होता.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-6244508556204289343?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/6244508556204289343/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=6244508556204289343' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/6244508556204289343'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/6244508556204289343'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='घर'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-6007509816951121464</id><published>2008-11-29T10:20:00.001+05:30</published><updated>2008-11-29T10:20:00.503+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजकारण व सामाजिक प्रश्न'/><title type='text'>आपण सारे अर्जुन! *</title><content type='html'>पोलिस आणि राजकारण्यांना शिव्या मारण आपल्या समाजाचा आवडता छंद आहे. शिव्या मारायला नको अश्यातला भाग नाही. पोलिस भ्रष्ट आहेत आणि राजकीय नेते भ्रष्ट, अप्पलपोटी आणि देशद्रोही आहेत. पण कठिण समय येता पोलिस लोक हेल्मेट घालुन जुन्या-पुराण्या बंदुका घेउन मुसलमानी अतिरेक्यांशी सामाना करायला सज्ज होतात. आपल्या कर्तव्याला उराशी बांधुन मृत्युला आलिंगन देणार्‍या पोलिसांना भ्रष्ट कस म्हणायच आणि देशाला विकुन स्वतःची पोळी भाजणार्‍या राजकारण्यांना जिवंत का सोडायच? मुंबईत घडलेल्यल्या (मी हा लेख लिहतांना हत्या-सत्र चालूच होत) घटनांवर काय लिहायच यावर मी बराच वेळ विचार करत होतो पण शब्दांची लपा-छुपी थांबत नव्हती. या दारूण परिस्थितीवर विचार प्रकट करण्यासाठी शब्द बहुधा बध्द व्हायला तयार नसावेत.&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आपला समाज शंढा सारखा हा नर-संहार कसा सहन करतोय? आपल्या समाजाच कौतुक कराव तितक थोडं आहे. बहुतेक सवय झाल्यावर कशाचीही तीव्रता कमी होते. हि भयानक स्थिती काही पहिल्यांदा आपल्यावर लोटली नाहीया. मूर्ख पत्रकार जगत या घटनेला भारताच ९/११ घोषित करू बघत आहे. अमेरिकेच्या भूमीवर ९/११ च्या आधी कधीच हल्ला झाला नव्हता. जेंव्हा की भारतावर अनेक ९/११ च्या भीषणतेचे हल्ले झाले आहेत. १९९३ चे स्फोट कस कोणी विसरू शकत? गेल्या पाच वर्षात (मूर्ख आणि नालायक शिवराज पाटील यांच्या गृह मंत्रालया अंतर्गत) भारताच्या प्रत्येक मुख्य शहरात स्फोट झाले आहेत. मुंबई, दिल्ली, गुवाहाटी, बंगालुरु, हैद्राबाद, अहमदाबाद. आता फारशी शहरच उरली नाहीयात.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या सगळ्या नर-संहारात अलिप्तपणे मनमोहन सिंग आणि शिवराज पाटील वावरतायत. जणु काही झालच नाही. अफझल गुरु ला फाशी का द्यायची? अतिरेक्यांनी गोळीबार केलेला चालेल पण पोलिस अतिरेक्यांना कसे काय मारू शकतात? दिल्लीला एका शूरवीर पोलिसाने आपले प्राण दिलेत तर त्यावर वादंग उठविण्यात (अत्यंत घृणास्पद मुलायम सिंह आणि अमर सिंहा सोबत) मनमोहन सिंहच आघाडीवर होते. स्वदेशाच्या पोलिस अधिकार्‍यांचे मनोबल खच्ची कसं कराव हे या लोकांकडून शिकाव. गेल्या महिन्यात कुठे तरी भाषण देतांना (या अकलेच्या कांद्याला भाषण देण्या पलिकडे काही येत का?) माननीय मनमोहन सिंह म्हणालेत की "सामान्य जनता पोलिस दलावर इतका अविश्वास का दाखवते याचा पोलिस दलाने विचार कराव" अरे नालायका, आपल्या माजघरात-देवघरात येऊन हि मुसलमानी अतिरेकी संहार मांडतायत आणि तू निष्क्रियतेची साक्षात मूर्ती कसा बनलेला आहेस हा विचार करून आम्हा सामान्यांची डोकी पिकली आहेत त्याच काय? आपल्या प्रेमळ शिवराज पाटीलांना मुसलमानी अतिरेकी आणि माओवादी अतिरेकी 'हरवलेले तरूण' वाटतात. त्या दैत्यांवर गोळ्या चालविण्या ऐवजी गुलाब पाण्याचा छिडकावा करायला हवा या मनोवृत्तीचे शिवराज पाटील आहेत. अफझल गुरुला सर्वोच्च न्यायालयाने फाशीची शिक्षा दिल्यावरही "त्याला फाशीची शिक्षा का द्यायची?" हा प्रश्न पाटील साहेबांना पडला. सध्याच्या मुंबई नर-संहाराच्या सुरुवातीसच " दोनशे अति-प्रशिक्षित जवान पहाटेच मुंबईला पोचणार आहेत" ही माहिती पाटील साहेबांनी पत्रकारांच्या द्वारे जणु अतिरेक्यांना पोचविली. किती मूर्ख असाव माणसाने! हा इसम मराठी मातीत जन्मला आहे याची मला खरोखरच लाज वाटते. पण या माणसाची लाळ सोनिया बाईंच्या पद-कमलांशी गळते त्यामुळे बाकी भारत चूलीत गेला तरी जो पर्यंत १० जनपथच्या मालकीण बाईंच ताईत गळ्यात आहे तो पर्यंत पाटील साहेबांचा बाल कोणी बाका करु शकत नाही. सोनिया तारी त्याला कोण मारी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीयांच्या नामुष्कीची ही परिसीमा आहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुनी शस्त्रास्त्र आणि जुनी चिलखत घालुन चढाईस निघालेल्या पोलिसांना बघितल कि जीव भरून येतो. खरच वाईट वाटत. भ्रष्ट असलेत तरी शेवटी समाज रक्षणासाठी प्राण हीच लोक वेचतात. एकतर राजकारण्यांनी पोलिस खात्याचा तमाशा बनवुन ठेवला आहे. एकी कडुन जनतेचा दबाव आणि दुसरीकडुन राजकारण्यांनी हात बांधुन ठेवलेले पोलिस खाते म्हणजे एक दारूण दृश्य आहे. या लोकांना पगार कमी असतात आणि दिवसाला १४ तास काम करावी लागतात. उच्च अधिकारी खालच्या अधिकार्‍यांशी अत्यंत वाईट वागतात. केवळ नोकरी म्हणुन नाईलाजास्तव काम करणार्‍या हवालदारांची कीव येते. त्यातून या लोकांच्या हातात नुसता दंडुका! हे डोंबल संरक्षण करतायत समाजाच. मुंबईत घडलेल्या घटनांमधे अतिरेक्यांकडील शस्त्रास्त्र बघितलीत तर दंडुके घेउन हिंडणारे हवालदार हे दृश्य हास्यास्पदच आहे. अर्थात यात चूक पैसे खाण्यात मग्न असलेल्या नेत्यांची आहे. विकासाची काम करतांना कोणी पैसा खाल्ला तर तेवढ वाईट वाटत नाही पण आजकालची नेते मंडळी म्हणजे काम न होऊ देण्यासाठी मुख्यत्वे पैसा खातात. गंमत म्हणजे हीच लोक खुप काळ जगतात.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुंबईवर हल्ला होणार आहे हे सांगायला कोणा वराह-मिहिराची आवश्यकता नव्हती. तीन (दोन?) वर्षापूर्वी लोकल मधे बाँब स्फोट झालेला होता. तसंच सर्व मुख्य शहरांमधे मनात येइल तेंव्हा अतिरेक्यांनी हल्ले केले होते त्यामुळे मुंबई अगला निशाना आहे हे अपेक्षितच होते. पण हा हल्ला थांबवायचा कसा? मुंबईतील करोडाहुन जास्त लोकसंख्येवर लक्ष ठेवायच कस? तसच प्रत्येक दिवशी मुंबईत ये-जा होत असलेल्या लाखो लोकांचा हिशोब ठेवायचा कसा? इतक्या विस्तृत प्रदेशावर लक्ष द्यायला अदृश्य व्हायला हव. गुप्तचर विभाग कार्यरत हवा तसंच त्यांचा पोलिस खात्याशी सतत संपर्क हवा. अतिरेकी सापडला तर त्याला फार वेळ जिवंत ठेवण्याची गरज नको. न्यायलय सजग हव. कायद्यांची अंमल बजावणी कडक व्हायला हवी. अफझल गुरु सारखे सैतान इतकी वर्ष तुकडे तोडत जिंवत ठेवायला नको. कायदा चोख असला तर दुष्कृत्य करायचे ध्राष्ट्य होत नाही. समाज संरक्षणाची हि शस्त्र नीट वापरली तर मुंबई सारख्या घटनांची पुनरावृत्ती होणार नाही. आणि असं होण फार कठीण आहे अश्यातलाही भाग नाही. के.पी एस. गिल यांनी अश्याच तर्‍हेनी पंजाब शांत केल. पण हे चक्र इथे थांबायला नको.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हे धर्म-युध्द आहे. आणि याची जाणीव जो पर्यंत आपल्या समाजाला होत नाही तो पर्यंत परिस्थिती कठिण आहे. येथे धर्म म्हणजे हिंदु-मुसलमान युध्द अपेक्षित आहे. मुंबईत या क्षणी बरीच मुसलमान पोलिस प्राणाची बाजी लावायला मागे-पुढे बघणार नाही. पण ही सर्व अतिरेकी मंडळी केवळ एकाच धर्मातून येतात हे सुध्दा मान्य करण आवश्यक आहे. या लोकांना प्रगती बघवत नाही. धर्मांध आणि धर्म-पंगु असलेल्या या लोकां विरुध्द लढायला सर्व समाजात एकजूट हवी. शेवटी पोलिस अधिकारी काय, स्पेशल कमांडो काय किंवा न्यायाधीश काय, हे सगळे समाजाचे अंग आहेत. थोडक्यात समाजाने स्वरक्षण स्वतःच करायला हव. श्वान जातीची राजकारणी मंडळी झी-प्लस सिक्युरीटीत रहातात. यांच्या घरच्या आया-बहिणी सुरक्षित आहेत. यांच्या वर गोळ्यांचे किंवा बाँबचे हल्ले होत नाहीत म्हणुन ही सगळी गांधीगिरी यांना सुचते. जनतेचे सेवक म्हणवणार्‍या या सैतानांपासुनच आपल्या सामान्यांना स्व-रक्षण करणे आवश्यक आहे. मुसलमानी अतिरेकी तर बोलुन चालून शत्रूच आहेत. पण नेत्यांच्या जातीने उपस्थित घरभेद्यांची खबर आपल्याला आधी घ्यायला हवी. आणि त्या साठी मताधिकारासारखे शस्त्र नाही. या सत्ता-पिपासु कुत्र्यांना त्यांची जागा दाखवुन द्यायला मताधिकारासारखा पट्टा नाही. आवश्यक प्रश्न विचारणे हे सुशिक्षित समाजाच कर्तव्य आहे. आणि बरोबर उत्तर न मिळाल्यास निवडणुका जिंकु न देण्याचे कार्य करणे आवश्यक आहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या युध्दात मार्गदर्शन करण्यासाठी श्री कृष्ण मिळण्याचे आपले भाग्य नाही. याचा अर्थ असा नव्हे की आपण सर्वांनी अर्जुन बनुन दिढमुढ व्हाव. मुंबई हत्या-सत्र काय किंव्हा दिल्ली, जयपूर आणि गुवाहाटीतील बाँब-स्फोट काय, या सगळ्या अघोरी भविष्याकडे जाणार्‍या पाऊलवाटा आहेत. परिस्थिती बिकट आहे आणि एकजुट होऊन सक्रियतेने बदल घडवुन आणण्यासाठी परिश्रम तातडीने घेतले नाहीत तर भविष्यात अत्यंत भीषण काळोख आहे.&lt;br /&gt;----*----&lt;br /&gt;&lt;em&gt; *आपण सारे अर्जुन हे व. पु. काळे यांच्या शेवटल्या पुस्तकांपैकी एक आहे. ललित शैलीत आपल्या समाजाचे संभ्रमित स्वरूप त्यांनी मांडले आहे. वाचकांनी हे पुस्तक अवश्य वाचावे ही विनंती. त्या पुस्तकाचे शिर्षक प्राप्त परिस्थितीस तंतोतंत लागू होते म्हणुन मी माझ्या या लेखालाही तेच शिर्षक कायम ठेवले आहे. &lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-6007509816951121464?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/6007509816951121464/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=6007509816951121464' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/6007509816951121464'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/6007509816951121464'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='आपण सारे अर्जुन! *'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-1456635130065291486</id><published>2008-09-30T20:02:00.004+05:30</published><updated>2008-09-30T20:11:19.060+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मनोगत'/><title type='text'>वायफळ बडबड</title><content type='html'>मला या महिन्यात तीन लेख टाकयचे होते. निर्माल्य कथा पूर्ण करायची होती आणि शिवराज्यारोहणाचा पुढला भाग ही लिहायचा होता. पण मी एक अक्षर सुद्धा लिहिलेलं नाही. आळशीपणाची पण सीमा असते. आणि या सिमोलंघनाचा पराक्रम करण्याची मला लहानपणा पासुन आवड आहे. असो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गेल्या शनिवारी एका प्रख्यात इतिहासकाराच्या सांनिध्यात वेळ घालविण्याची संधी मिळाली. बर्‍याच गोष्टींवर चर्चा झाली. त्यांच्या सारख्या थोरा-मोठ्यांनी माझ्या सारख्या पोरा-टोरांना वेळ द्यावा ही थोडी नवलाईची गोष्ट वाटते. कोणाला भेटाव आणि कोणाला भेटू नये यातून थोरपणा सिध्द करणारे राजकीय नेत्यांच्या जमातीत मोडतात. याला मी भाड्याचा थोरपणा म्हणतो. खरे थोर हे त्यांच्या कार्यामुळे ठरतात. एका ध्येयासाठी आपले आयुष्य वेचण हि काही सोपी गोष्ट नाही. कुठला तरी लेख, भाषण किंवा चित्रपट बघुन भारावून सगळेच जातात पण दुसर्‍या दिवशी ये-रे माझ्या मागल्या सारख आपण आपल्या आयुष्यात परत गुरफटुन जातो. थोडक्यात आपण आपले सामान्यत्व दुसर्‍याच घटकेला सिध्द करतो. पण काही 'वेडगळ' लोक असतात जे नुसते भारावून न जाता त्या विचारसरणीत स्वत:ला झोकुन देतात. समाजाच्या प्रगतीसाठी झटत रहातात. या मार्गातील कठिण परिस्थितीतून ते असामान्य होउन बाहेर पडतात. राजकीय नेते ज्यांचे पुतळे सगळी कडे दिसतात, ते फक्त पुतळ्यांच्याच रूपात समाजाचा एक अर्थहिन भाग बनतात. तर हि असामान्य लोक समाजाला समृध्द करून अमर होतात. असली लोक फार अल्प संख्येत आढळतात. ती लोकं पटकन ओळखुही येत नाही. या लोकांना शोधाव लागत. सध्य-परिस्थितीत या लोकांची आपल्या समाजाला नितांत आवश्यकता आहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतात सध्या दिवाळीच्या आधीच धमाक्यांची माळ लागलीय. लोकांचे जीव जातायत आणि आपले शिवराज पाटील मात्र त्यांच्या खुर्चीत स्थिर आहे. एका परदेशी बाईचे पाय चाटण्यात भूषण मानणार्‍या या मराठी माणसाची कीव येते. आणि असल्या शंख माणसाला निवडूण दिल्याबद्दल भारतीय समाजाचा राग येतो. पण काही मार्ग दिसत नाही. समाज जातींच्या विभाजनाने पोखरलेला आहे. प्रत्येकाला आरक्षणात हिस्सा हवा. भारतीय समाजाचे विभाजन करण्याचे इंग्रजी सत्तेने चालू केलेले कार्य आजचे नेते धडाडीने पुढे करतायत. त्यातूनच विश्वनाथ प्रताप सिंह किंवा अर्जुन सिंह सारखे अत्यंत घृणास्पद आणि गलिच्छ व्यक्ति देशाचे भविष्य अंधारात ढकलतात. तरीही कुंभकर्ण रूपी समाजाची निद्रा चळत नाही हे आश्चर्यच आहे. घोड्याला पाण्याजवळ नेता येतं पण पाणी पाजु शकत नाही. तस सगळ्या गोष्टी समजुनही समाज त्यावर काही कृती करण्यास नकार देत असेल तर खुदा बचाए!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बर्‍याच गप्पा झाल्यात. तिसरा लेख लिहिला गेला हे बरं झाल. त्यातून काही फारस निष्पन्न होणार आहे अश्यातला भाग नाही पण मनाला खोटा दिलासा मिळणार एवढच.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-1456635130065291486?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/1456635130065291486/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=1456635130065291486' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/1456635130065291486'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/1456635130065291486'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2008/09/blog-post_30.html' title='वायफळ बडबड'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-4035569780231539313</id><published>2008-09-16T11:29:00.000+05:30</published><updated>2008-09-16T11:29:00.611+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिव-महिमा'/><title type='text'>शिव-राज्यारोहण - भाग १</title><content type='html'>मराठी जन-मानसात शिवाजी महाराजांच्या राज्याभिषेकाला विशिष्ट महत्त्व आहे. भारताच्या गेल्या हजार वर्षाच्या गडद इतिहासात फार थोड्या घटना भारतीयांच्या कपाळावर विजयाचा टिळा लावतात. विजयानगरचे साम्राज्य, असाम मधील अहोम राजघरण्याचा अपराजित इतिहास आणि राजांचे राज्यारोहण त्यातील प्रमुख मानल पाहिजेत. विजयानगरच्या हिंदुशाहीबद्दल सगळ्यांना महिती आहेच. असामच्या अहोम राजघराण्याबद्दल मी वेगळा लेख लिहितो आहे. पण मग आधी म्हटल तस की महाराजांच्या राज्याभिषेकाला मराठी मनात विशिष्ट स्थान आहे तर त्यांबद्दल लिहिण्याची काय गरज? त्याच सोपं कारण अस कि मराठी लोकांना या राज्याभिषेका बद्दल काय वाटत त्याल फारसा अर्थ उरलेला नाही. मागल्या लेखात महाराजांना चोर-दरोडेखोर का म्हटल्या जात याचा संक्षिप्तात आढावा आपण घेतला, या लेखात त्यांच्या राज्याभिषेका मागच्या कारणांचा विचार करु या.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मी अक्षरशः दर दोन ओळींमागे महाराजांनी स्वार्थासाठी स्वतःचे सिंहासन स्थापन केले नाही अस म्हणतो आहे. कारण या राज्यारोहणामागे स्वार्थ असता तर त्यांनी १६७४ उजाडण्याची वाट बघितली नसती. १६६८ मधेच तो कार्यक्रम त्यांनी उरकला असता. पण त्यांनी हा लढा स्वतःचे राज्य प्रस्थापित करण्यासाठी मांडला नव्हता. त्या हिशोबानी चाणक्य शिष्य चंद्रगुप्त मौर्य सोडुन भारतीया परंपरेतील कुठल्याही राजाशी त्यांची तुलना होत नाही. त्यांच्या आधिच्या प्रत्येक राजाचा लढा स्वकियांशीच होता. स्वतःचे राज्य वाढविण्यासाठी हे राजे आपापसात लढत असत. चंद्रगुप्तानी नंदाचा नाश जरी केला असला तरी त्याचे (आणि त्यान्वये चाणक्याचे) मुख्य लक्ष अलेक्स्झांडरची सत्ता उलथण्याचा होता. त्याच प्रमाणे महाराजांचे मुख्य लक्ष परकीय मुसलमानांची सत्ता उलथण्याचा होता. म्हणुन त्यांनी स्थापित केलेल्या राज्याला स्वराज्य म्हणायचे. त्यांना अत्याचारी मुसलमानी सत्ता उलथवायच्या होत्या हे तर जगजाहिर आहे पण या मुसलमानी सत्तांमधेही आपापसात एक वेगळे राजकारण चालत असे. दख्खनी बादशाह्या या धर्मांतरीत मुसलमानांच्याच होत्या. त्यामुळेच मुघली सत्ता या दख्खनी बादशाह्यांना निम्न दर्जा देत असत. या 'नविन' मुसलमानांच्या सत्ते ऐवजी 'स्वच्छ' मोघल रक्ताची आणि सच्च्या मुसलमानांची सत्ता अधिक उपयुक्त अशी मुघलशाहीची धारणा होती. त्यापायी त्यांनी दख्खनी शाह्यांवर अनेक आक्रमणे केली. औरंगझेब स्वतः दख्खन मधे दोनदा आला. पहिल्यांदा आला. पहिल्यांदा १६५७ मधे जेंव्हा महाराज जावळी घेण्याच्या उद्योगात होते. आणि दुसर्‍यांदा १६८२ मधे  तो खास मराठ्यांना भेट द्यायला आला. मराट्यांनीच त्याची व्यवस्थित विल्हेवाट लावली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक गोष्ट मात्र नक्की की मोघल असो किंव्हा नुकतेच धर्मांतर केलेले मुसलमानांच्या सत्ता असो, कोणा हिंदुनी राज्य प्रस्थापित केलेले कोणीच खपवुन घेणार नव्हते. ९व्या १० व्या शतकात इराणी आणि अरब मुसलमान अफगाणीस्थानातील खोकर राज्याशी वर्षानुवर्षे भांडुन त्या राज्याचा पडाव केला. तीच स्थिती गुजरातेतील सोळंकी किंवा देवगिरीच्या रामदेवरायाची झाली. बंगालमधील सेन घराण्याचीही तीच कथा. दख्खनेतील मुसलमानी सुल्तान शतकानुशतके दक्षिणेतील लहान लहान हिंदु राजघराण्यांना नष्ट करण्याच्या मागे होते.मोघलांनी आसाम मधल्या अहोम राज्याला नष्ट करण्यासाठी प्रचंड परिश्रम घेतलेत. विजयानगरचे साम्राज्य नष्ट करण्यासाठी आपापसात भांडणार्‍या पाच मुसलमानी सत्ता एकत्र आल्यात. आणि तालिकोटाच्या विजया नंतर विजयानगरातील प्रत्येक इमारत या आक्रमकांनी जमिनदोस्त केली. प्रत्येक पुरुषाला ठार केले आणि प्रत्येक बाईला बाजारात विकले.  या सगळ्या मागचा मुख्य उद्देश हिंदु मनात उठाव करण्याचा विचारच कधी यायला नको हा होता. हिंदु लोक सत्ता चालविण्यास कुचकामी आहेत. ते लढवय्ये मुळीच नाहीत. पळपुटे, भ्याड आणि धर्महिन असली ही हिंदु जात फक्त नोकरशाही करण्यापलिकडे फारशी उपयोगी नाही असली समजुत या मुसलमानी लोकांची होती. हिंदुंना स्वतः बद्दलच लाज वाटावी हा मुख्य उद्देश. .गंमतीचा भाग असा की या मुसलमानी बादशाह्यांच्या चाकरीत लढवय्ये असे बरीच हिंदु मंडळी होती पण हि सगळी लोक गुलामीलाच भूषण मानित असत. मिर्झा राजे जयसिंह हे त्या मिंधेपणाचे ज्वलंत उदाहरण आहे.  अर्थात, यात काही नविन नाही. सगळे विजेता आक्रमक असच करतात  इंग्रजांनीही तेच केले. पण अश्या परिस्थितीत या आक्रमकां विरुध शिवाजी महाराजांनी केवळ रणांगणातच यश संपादन केले नाही तर मुत्सद्देगिरीत आणि राज्य व्यवस्थापनेतही ते या परकियांपुढे सर्वस्वी वरचढ ठरलेत. त्यांनी केवळ धर्म रक्षणच केले नाही तर धर्म संवर्धनासाठी हि ते झटले. त्या काळात राज्य हि धर्माच्या आधारावरच ठरवली जात असत. मुसलमानी आक्रमकांच्या राज्यांमधे बहुतांश लोक हिंदु असले तरी हि आक्रमक राज्यकर्ते मुस्लीम धर्म वाढविण्यासाठीच झटत असत. पण इथेही राजे त्यांच्या सांप्रत काळाहुन पुढे होते. ते स्वतःला  हिंदु धर्म संरक्षक जरी मानत असले तरी त्यांनी इतर धर्मांना मुळीच त्रास दिला नाही. अगदी चढाया करण्याच्या वेळेसही कुठल्याही धार्मिक स्थळांना हात लाविण्याची परवानगी सैन्यास नव्हती. सुरत लुटण्याच्या वेळेस तिथल्या एका ख्रिश्चन पाद्रीच्या इमारतीस मराठ्यांनी मुळीच त्रास दिला नाही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१६७४ साला पर्यंत महाराजांनी आदिलशाहीस नेस्तनाभूत केले होते. पोर्तुगीज लोक महाराजांशी गोडी-गुलाबीचे संबंध ठेउ बघत होते. इंग्रजांची शक्ति थोडा-फार उपद्व्याप करण्या पलिकडे फारशी नव्हती. निजामशाही तर कधीच मोडकळीस आली होती. उत्तरेस बागलकण्यापर्यंत (रामनगर आणि कोळी राज्या पर्यंत. म्हणजे सुरतेपासुन दोन-तीन तासाच्या अंतरापर्यंत) तर दक्षिणेस गोव्या पर्यंत महाराजांची अनभिषिक्त सत्ता होती. पूर्वेस ते अहमदनगर पर्यंत आरामात फेर-फटाका मारून येऊ शकत असत. अहमदनगर तेंव्हा मुघलांचे फार महत्त्वाचे सैन्य विभागाचे ठिकाण होते. मुख्य म्हणजे या सर्व भागातील कर मराठा सत्तेस मिळत असत. तसांच मराठी न्याय या भागात कार्यरत होता. तिथे कुठल्याही बादशहाचा अंमल चालत नसे. या प्रदेशातील कुठलाही भाग जिंकण्यास बादशाही सैन्यास मराठा सैन्याशी टक्कर द्यावी लागत असे. पुणे भागात मिळालेल्या लहानश्या जमिनीच्या तुकड्यापासुन महाराजांनी एवढे मोठे राज्य स्थापन केले. त्यांची शासन व्यवस्था, सैन्य मांडणी तसेच राजा आणि राज्याची कर्तव्ये इत्यादी  कारभाराची सर्व अंगे हि प्रस्थापित मुसलमानी सत्तेच्या तुलनेत क्रांतिकारी होती.  थोडक्यात सार्वभौम राजा बनण्यासाठी आवश्यक कारणे आणि आवश्यक पराक्रम त्यांनी केलेला होता. राज्य व्यवस्था, धर्म संस्थापन आणि संवर्धन आणि स्वराज्य स्थापन हि सर्व कामे त्यांनी यशस्वी रित्या पूर्ण केलेली होती. त्यामुळे राज्यारोहण हे खर्‍या दृष्टीने यशाचा मुकुटमणी होता. ही केवळ औपचारिकता नव्हती, ती आवश्यकता होती. काळाची गरज होती. या समारंभाचे प्रतिसाद भारतभर उमटणार होते. मानसिक हार मानलेल्या हिंदु समाजात कणा उत्पन्न करण्याचे कार्य या राज्यारोहणाने केले. स्वातंत्र्यतेचे बीज जरी आधी रोवल्या गेले असले तरी हिंदुंमधे स्वातंत्र्याचा होमकुंड यशस्वीपणे पेटविण्याची शक्ती आहे हे  या सोहळ्याने सिध्द केले. पृथ्वीराजा नंतर स्वतःचा  बळावर राज्याभिषेक करणारे महाराज हे केवळ तिसरे शूरवीर होते. (हरिहर राय आणि बुक्का हे विजयानगर सत्तेचे संस्थापक सिंहासनधीश होते. तसच 'विक्रमादित्य' हेमू हा दिल्लीत फार थोड्या काळासाठी सत्ताधीश होता.) तर  तीन आघाड्यांवर लढा देऊ शकणारे ते फक्त दुसरे लढवय्ये होते. पंड्या किंवा चोला राज्यांनंतर नौदल स्थापन करणारे ते पहिले दूरद्रष्टे होते.  या सगळ्या कारणांचा विचार करुनच महाराजांनी स्वतःचा राज्याभिषेक करण्याचे ठरवले.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एवढी पार्श्वभूमी ठळकपणे दिसत असली तरी मागे म्हटल्या प्रमाणे मुघली सत्ता १८५७ पर्यंत चालली असे का मानतात? त्यामागच्या राजकारणाचा विचार पुढल्या लेखात करू या.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-4035569780231539313?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/4035569780231539313/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=4035569780231539313' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/4035569780231539313'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4303115948490483398/posts/default/4035569780231539313'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://marathimauli.blogspot.com/2008/09/blog-post_16.html' title='शिव-राज्यारोहण - भाग १'/><author><name>Chinmay 'भारद्वाज'</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12232371025236519101</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='01569462682538379459'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4303115948490483398.post-1288269460365408226</id><published>2008-09-05T09:12:00.000+05:30</published><updated>2008-09-05T09:12:00.378+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दीर्घकथा'/><title type='text'>निर्माल्य - भाग ३</title><content type='html'>माईंच्या डोळ्यातील अश्रुंचीच जणु पाऊस वाट बघत होता. एकसंथ पावसाची रीघ लागली. इतका वेळ गद्द झालेली हवा लगेच मोकळी झाली. बघता बघता हवेत गारवा आला. माई उठल्या, त्यांनी डोळे पुसले आणि माजघरात आल्या. सून रडून रडून झोपून गेली होती. दिवे लागणीची वेळ व्हायला आली होती. माजघरातल्या बायकांना माईंना बघुन नेमक काय बोलायच किंवा काय करायच कळत नव्हत. खर सांगायच तर माई इतक्या कमी रडल्या होत्या त्याचीच सगळ्यांना काळजी वाटत होती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"माई या बसा" म्हणत कोणीतरी खुर्ची आणुन दिली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माईंच लक्ष नव्हत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"काय करताय अक्का?" माईंनी स्वयंपाकघरात गॅसपाशी उभ्या असलेल्या बाईला विचारल. एका शेगडीवर दूध ऊतू जात होत. अक्का गॅसशी झटापटी करत होत्या. गावात दोन-तीन घरांमधेच गॅस होता. अविनाश ने नुकताच घरी सिलेंडर लावला होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"चहा करत होते सगळ्यांसाठी पण या शेगडीची मेली भानगड कळत नाही." अक्का उत्तरल्या. माईंनी दुसर्‍या शेगडीकडे नजर टाकली. दुसर्‍या शेगडीवर काहीतरी खदखदत होत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पिठल करत होते. लोक येतीलच, जेवायच तर लागेलच ना" अक्कांच्या चेहर्‍यावर अपराधी भाव उगाच होते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बरं सुचल तुम्हाला" अस म्हणत माई वर्‍हाड्यांत पुन्हा आल्या आणि अण्णांच्या आरामखुर्चीवर अंगाची घडी करून बसल्या. घरात पिठल शिजतय या विचाराने त्यांना हसु आल. जो जायचा तो जातोच पण मागे राहिलेले भूकेच्या पछाड्यातून थोडीच सुटतात. भूकेला काही भावना नसतात. त्यांनी पदरात स्वतःल गुरफुटुन घेतल आणि चुकलेल्या गणितांचे हिशोब त्या करू लागल्या. पण कुठे हातचा चुकला त्यांना परत कळेनास झाला. ती संध्याकाळ त्यांच्या घशाशी आली होती. त्या परत आठवणींच्या गुहेत नाहीश्या झाल्या.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोणाचही कोणावाचुन आणि कशावाचुन अडत नाही. रहाटगाड चालूच रहात. बघता बघता पोरं मोठी झाली. श्रीकांत लहाना आणि अविनाश मोठा. दोघांमधे चार वर्षाच अंतर होत. दोघांमधे पण त्यांच्या स्वभावात जमिन-आस्मान चा फरक होता. परिस्थिती छन्नी प्रत्येक मनुष्यावर निर्-निराळ्या तर्‍हेनी आकार देते. आईची होणारी सततची तक-तक आणि वडिलांची होत असलेली दुर्दशा बघुन अविनाश स्वभावाने विचारी आणि शांत झाला. घरची जवाबदारी लौकरात लौकर खांद्यावर घेण्याच्या दृष्टीने त्यांचे प्रयत्न चालू असे. त्यांने आपले शिक्षण नीट पूर्ण केले. त्या काळात उठ-सुट सगळे इंजिनिअर होत नसत तेंव्हा त्याने मुंबई महाविद्यालयातून मेकानिकल इंजिनिअरिंग पूर्ण केले. मुंबईलाच टाटा कंपनीत तो नोकरीला लागला होता. तो वडिलांवर गेला होता. अत्यंता हुशार आणि परिस्थितीमुळे कष्टीक. आईची काळजी त्याला सतत लागलेली असे. त्यामुळेच माईंची मदार अविनाश वर असे. श्रीकांतची काही फारशी शाश्वती नव्हती. तो लौकीक दृष्ट्या वाया गेला होता अस म्हणता येणार नाही पण निकम्मा जरूर होता. त्याने शिक्षण पूर्ण केल तरी पावलं अशी परिस्थिती होती. बुध्दु होता अश्यातला भाग नाही पण उनाडक्या करण्यातचा त्याचा बहुतांश वेळ जात असे. घरी बापाचा धाक नाही आणि आईला तो जुमानित नसे. त्याचाही आईवर जीव होता पण त्या पलिकडे आपली काही जबाबदारी आहे असे त्याला वाटत नसे एवढच. अविनाश ला नोकरी लागल्याच्या दोन वर्षाच्या आत माईंनी त्याला बोहल्यावर चढवला. गावातलीच मुलगी होती. तीनेही बी.ए. पूर्ण केल होत आणि माईंच्या शाळेत नुकतीच शिक्षिका म्हणुन लागली होती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अण्णाच्या आजारपणाला सुरुवात झाल्यापासुन पुढल्या वीस वर्षाचा काळ इतक्या झपाट्याने गेला की माईंना फारसा विचार करायला फुरसत मिळाली नाही. सुरुवातीची देव-देवके थंडावली होती. अण्णा असेच रहाणार हे माईंनी मान्य केले होते. नवर्‍याचे सुख त्यांना सुरुवातीची चार-पाच वर्ष सोडलीत तर कधीच लागले नाही. अण्णांचे व्यक्तीमत्व गेल्या वीस वर्षात सप्तरंग दाखवुन आता पांढरे फटक पडले होते. कुठल्याही भावनांचा लवलेश त्यांच्यात उरला नाही. फिटस मधुन मधुन येत असत. घरच्यांना नेमकं काय करायच हे पक्क माहिती होते. फिटस येउन गेल्यावर थोडं बहुत बोलणारे अण्णा अजुन गडद होत असत. परत पूर्ववत यायला दोन आठवडे लागत. पूर्ववत येण म्हणजे खायला दे किंवा चहा कर एवढ्या पूर्तीच त्यांची बौध्दीक क्षमता सिमित झाली होती. सुख-दु:खाच्या पलिकडे ते जणु गेले होते. आल्या -गेल्यांची विचारपूस नाही किंवा घरात होत असलेल्या गोष्टी मधे रस नाही. लाकडाची मूर्ती जणु घरात फिरत असे. पेपर मात्र दररोज वाचत असत. सकाळचा पेपर संध्याकाळ पर्यंत ते रात्रीपर्यंत पेपर त्यांच्या हातात असे. काय कळायच त्यात त्यांना देवच जाणे. थोडक्यात ते आहेत काय आणि नाही काय एकच होत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोन पोरांपैकी एक तर मार्गी लागला होता. संसारी पुरुष झाला होता. लहान्याची चिंता होती. पण अविनाश ओळखीनेच टाटाच्याच कुठल्या कारखान्यात श्रीकांतला लावण्याच म्हणत होता. रावसाहेबा शिक्षण पूर्ण कधी करतात त्यावर सगळ अवलंबुन होत. एकुण माईंच्या जीवनातील वादळ शांत होण्याच्या मार्गावर होतं. त्यांच्या शुष्क मनावर कर्तव्य पार पाडल्याचा भावनांची सावली पडत होती. खुप वर्षांनी त्यांना समाधान वाटत होत. शाळेतून घरी आल्या की त्यांना शांत वाटत असे. खुप वर्षांनी त्यांना स्वस्थता मिळत होती. अविनाशच नुकतच झालेल लग्न आणि घरात खुप वर्षांनी अजुन एका स्त्रीचा वावराने माईंच मन हुळहुळत होत. लौकरच नातू येणार घरात आणि घर परत खेळत होणार. नातवाला धडधाकट आई-वडिल असणार या विचाराने माईंना आनंद होत असे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुंबईहुन बसने अविनाश जा-ये करत असे. आणि एके दिवशी परत येतांना बस मोकळी होती म्हणुन तो पाय लांब करून झोपला. रात्रीची वेळ होती. अविनाश घरी उशीरा येत होता. बस वेगाने जात होती. मधेच कोणी तरी आल म्हणुन चालकाने करकचून ब्रेकस दाबले. अविनाश गाढ झोपला होता तो सीटवरून घसरला आणि त्यांच डोक दाणकन विरूध्द दिशेच्या सीटच्या लोखंडी भागाला आपटले. निमिषार्धात सगळ घडल आणि झोपेतच काही कळायच्या आत अविनाश मृत झाला. बस-चालकाला सुध्दा काही कळल नाही. बस जेंव्हा डेपोत गेली तेंव्हा हा कोण वेडा-वाकडा माणुस पसरलाय म्हणुन बस चालक बघायला गेला तेंव्हा सगळ त्याच्या लक्षात आला. सकाळी नेहमी सारखा कामावर गेलेला अविनाश फक्त देहरुपीच परतला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काळ कुणासाठी थांबत नाही अस म्हणतात. न थांबायला काळाला जायच तरी कुठेय? काळ पुढेही जात नाही आणि मागेही जात नाही. तो तसाच असतो. स्थिर, चिरंतन चिराकाल. पुढे रेटत जात ते माणसाच घोंगड. दुसरा पर्यायही नसतो. दैव फासे खेळायला बसवतो पण फासे फक्त दैवच टाकत. फक्त भोगण आपल्या हातात असत. माईंच्या मनात असल्या काहीश्या विचारांचा फडफडाट होत होता. पण मग त्या निश्चयाने उठल्या. आधी डाव उलटला तेंव्हा त्यांनी हार मानली नव्हती आणि आत्ताही त्या धडाडीनेच पुढे जाणार होत्या. सुनेला सावली देणार होत्या. त्यांनी मनात पुढचे आराखडे बांधायला सुरुवात केली. तीचं शिक्षण कस पुढे चालू करायच. तिचा जीव कसा रमवायचा. कधीही न भरणार्‍या जखमेवर हात ठेउन त्या पुढे जाणार होत्या. त्यांच्याकडे अजुन कुठला पर्यायही नव्हता.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4303115948490483398-1288269460365408226?l=marathimauli.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://marathimauli.blogspot.com/feeds/1288269460365408226/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4303115948490483398&amp;postID=1288269460365408226' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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